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प्राकृतिक खेती से टिकाऊ कृषि और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा भारत

— डॉ. देवेश चतुर्वेदी, पूर्व सचिव, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार

मृदा स्वास्थ्य सुधारने के साथ रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाने पर जोर

नई दिल्ली। भारत कृषि क्षेत्र में तेजी से प्रगति कर रहा है। पिछले पांच वर्षों में कृषि क्षेत्र की विकास दर 4 प्रतिशत से अधिक रही है। खाद्यान्न, बागवानी और तिलहन का रिकॉर्ड उत्पादन किसानों द्वारा नई तकनीकों को अपनाने तथा सिंचाई विस्तार, जल उपयोग दक्षता और उर्वरकों की समय पर उपलब्धता जैसी सरकारी नीतियों का परिणाम है। हालांकि, रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मृदा स्वास्थ्य में गिरावट और प्रमुख फसलों की उत्पादकता में ठहराव चिंता का विषय बनता जा रहा है।

पूर्व कृषि एवं किसान कल्याण सचिव डॉ. देवेश चतुर्वेदी ने अपने लेख में कहा है कि रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते उपयोग के बावजूद उत्पादकता में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो रही है। नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (NUE) में गिरावट के कारण किसान लगातार उर्वरकों की मात्रा बढ़ा रहे हैं, जिससे मृदा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

मिट्टी में जैविक कार्बन की कमी चिंता का विषय

सरकार की मृदा स्वास्थ्य एवं उर्वरता योजना के तहत देशभर में 26 करोड़ से अधिक मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरित किए गए हैं। इनके आंकड़ों से मिट्टी में जैविक कार्बन (SOC) की कमी के साथ-साथ कई सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी सामने आई है। स्वस्थ मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा एक प्रतिशत से अधिक होना बेहतर माना जाता है, जबकि कई क्षेत्रों में इसका औसत स्तर करीब 0.5 प्रतिशत और कुछ स्थानों पर 0.3 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

जैविक कार्बन की कमी से मिट्टी की जल धारण और जल सोखने की क्षमता प्रभावित होती है। बारिश और सिंचाई का पानी बह जाता है, जिससे ऊपरी उपजाऊ मिट्टी का क्षरण होता है। इससे भूजल पुनर्भरण और पौधों को पर्याप्त नमी मिलने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।

उर्वरकों की बढ़ती मात्रा से दोहरा नुकसान

मिट्टी में जैविक कार्बन कम होने से पौधों की पोषक तत्व ग्रहण करने की क्षमता भी घटती है। समान उत्पादकता हासिल करने के लिए अधिक उर्वरक डालना पड़ता है। इससे उर्वरक उपयोग दक्षता और मिट्टी की सेहत दोनों प्रभावित होती हैं। साथ ही रासायनिक उर्वरकों या उनके कच्चे माल के आयात पर देश का विदेशी मुद्रा खर्च भी बढ़ता है।

अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों और असंतुलित कीटनाशक उपयोग से मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों और कीटों की संख्या भी प्रभावित होती है। ये सूक्ष्मजीव मिट्टी की संरचना सुधारने और पोषक तत्वों को पौधों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्राकृतिक खेती को राष्ट्रीय मिशन से बढ़ावा

इन चुनौतियों के बीच सरकार ने वर्ष 2024 में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन शुरू किया। इसका उद्देश्य पशुधन और स्थानीय संसाधनों पर आधारित रसायन मुक्त खेती को बढ़ावा देना, मृदा स्वास्थ्य में सुधार करना, पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता बढ़ाना और रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों पर निर्भरता कम करना है।

प्राकृतिक खेती में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों, विशेषकर देशी नस्ल की गाय के गोबर और गोमूत्र से तैयार जैविक घोल एवं अन्य प्राकृतिक इनपुट का उपयोग किया जाता है। बीज उपचार के लिए बीजामृत, मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों को बढ़ाने के लिए जीवामृत और घनजीवामृत तथा कीट नियंत्रण के लिए नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र, अग्निअस्त्र और दशपर्णी अर्क जैसी प्राकृतिक विधियों का उपयोग किया जाता है।

18 लाख से अधिक किसानों तक पहुंच का लक्ष्य

राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के सहयोग से 7.5 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र को कवर करने और 18 लाख से अधिक किसानों तक पहुंच बनाने का लक्ष्य रखा गया है। न्यूनतम 50 हेक्टेयर के क्लस्टर बनाए जा रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्रों के वैज्ञानिक, किसान प्रशिक्षक और कृषि सखियां किसानों को प्रशिक्षण देकर प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।

किसानों को प्राकृतिक कृषि इनपुट उपलब्ध कराने के लिए स्थानीय डेयरी और गौशालाओं में बड़ी संख्या में जैव-इनपुट संसाधन केंद्र भी स्थापित किए जा रहे हैं।

वैज्ञानिक परीक्षण और प्रमाणन पर भी जोर

प्राकृतिक खेती को व्यापक स्तर पर अपनाने के लिए वैज्ञानिक परीक्षण पर भी जोर दिया जा रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने अलग-अलग क्षेत्रों और फसलों के लिए प्राकृतिक खेती की संभावनाओं से संबंधित मानचित्र तैयार किए हैं। ICAR के संस्थानों और कृषि विश्वविद्यालयों में प्राकृतिक खेती की प्रभावशीलता को वैज्ञानिक रूप से परखा जा रहा है।

प्राकृतिक उत्पादों की बेहतर कीमत और बाजार उपलब्ध कराने के लिए प्रमाणन व्यवस्था भी विकसित की जा रही है। राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र (NCONF) ने प्राकृतिक खेती के प्रमाणीकरण के लिए प्रोटोकॉल तैयार किए हैं। सहभागी गारंटी प्रणाली (PGS) के तहत प्रमाणित किसान अपने उत्पादों को बेहतर बाजार और प्रीमियम कीमत पर बेच सकते हैं।

प्राकृतिक खेती के साथ हाइब्रिड मॉडल पर भी जोर

लेख में प्राकृतिक खेती के साथ कम मात्रा में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग वाले हाइब्रिड मॉडल को भी उपयोगी विकल्प बताया गया है। इस मॉडल से उत्पादकता बनाए रखते हुए धीरे-धीरे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम की जा सकती है। कई फसलों में किसानों द्वारा प्राकृतिक खेती की ओर क्रमिक बदलाव के बाद रासायनिक इनपुट को पूरी तरह समाप्त करने के अनुभव भी सामने आए हैं।

डॉ. चतुर्वेदी के अनुसार, प्राकृतिक खेती न केवल टिकाऊ कृषि को बढ़ावा दे रही है, बल्कि पशुधन के आर्थिक महत्व को भी बढ़ा सकती है। दूध देना बंद करने के बाद अनुपयोगी समझे जाने वाले पशुओं से प्राकृतिक खेती के लिए उपयोगी संसाधन प्राप्त हो सकते हैं। इससे सुरक्षित खाद्य उत्पादन, किसानों की आय और देश की विदेशी मुद्रा बचत को भी बढ़ावा मिल सकता है।

आत्मनिर्भर कृषि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

मध्य पूर्व में जारी संकट के बीच प्रधानमंत्री द्वारा नागरिकों से रासायनिक उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग और प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील का भी लेख में उल्लेख किया गया है। प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना मृदा स्वास्थ्य संरक्षण के साथ-साथ कृषि क्षेत्र को अधिक टिकाऊ, कम लागत वाला और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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