हरी खाद से प्राकृतिक खेती की ओर बढ़े किसान, महासमुंद के हिमांशु बंजारे बने प्रेरणा

रायपुर, 4 जुलाई 2026। छत्तीसगढ़ में प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार के प्रयासों का सकारात्मक असर अब ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई देने लगा है। महासमुंद जिले के बसना विकासखंड के ग्राम बड़ेसाजापाली के प्रगतिशील किसान हिमांशु बंजारे ने ढैंचा की हरी खाद अपनाकर कम लागत और टिकाऊ खेती की दिशा में मिसाल पेश की है।
हिमांशु बंजारे ने अपने 0.80 हेक्टेयर खेत में ढैंचा की फसल लगाई है। लगभग 30 दिन की इस फसल को निर्धारित समय पर खेत में पलटकर हरी खाद के रूप में उपयोग किया जाएगा। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी और आगामी फसलों की उत्पादकता में सुधार होगा।
हिमांशु बंजारे का कहना है कि प्राकृतिक और जैविक खेती खेती की लागत कम करने के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करती है। उन्होंने बताया कि ढैंचा जैसी हरी खाद वाली फसलें खेत में प्राकृतिक रूप से पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाती हैं और उत्पादन को अधिक टिकाऊ बनाती हैं। उन्होंने अन्य किसानों से भी इस पद्धति को अपनाने की अपील की।
कृषि विभाग के उप संचालक एफ.आर. कश्यप ने बताया कि हरी खाद मिट्टी की उर्वरता और संरचना सुधारने का प्रभावी माध्यम है। ढैंचा, सन, लोबिया, उड़द, मूंग और ग्वार जैसी दलहनी फसलें कम समय में तैयार होकर कम लागत में अधिक मात्रा में जैविक पदार्थ उपलब्ध कराती हैं। इन्हें फूल आने से पहले खेत में पलटने पर प्रति हेक्टेयर 50 से 60 किलोग्राम तक नाइट्रोजन की आपूर्ति होती है, जिससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है।
उन्होंने बताया कि हरी खाद के नियमित उपयोग से मिट्टी भुरभुरी बनती है, जलधारण क्षमता बढ़ती है, वायु संचार बेहतर होता है और मृदा में सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ने से उसकी उर्वरा शक्ति में दीर्घकालिक सुधार होता है। साथ ही यह मृदा क्षरण रोकने और पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कृषि विभाग का कहना है कि किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और जागरूकता के माध्यम से प्राकृतिक एवं जैविक खेती के लिए लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है। हिमांशु बंजारे जैसे किसानों की पहल प्रदेश में टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल कृषि को नई दिशा दे रही है।


