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अधिक वर्षा में लेही विधि से करें धान की बुआई, कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को दी सलाह

रायपुर, 6 जुलाई 2026। छत्तीसगढ़ में लगातार हो रही बारिश और मानसून की वर्तमान स्थिति को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को अधिक जलभराव वाले क्षेत्रों में लेही विधि से धान की बुआई करने की सलाह दी है। कृषि विभाग के अनुसार जिन खेतों में पर्याप्त पानी भर गया है और बारिश लगातार जारी है, वहां रोपाई के बजाय अंकुरित बीजों की लेही पद्धति से बुआई अधिक उपयुक्त होगी।

वैज्ञानिकों ने बताया कि इस वर्ष मानसून सामान्य से लगभग 10 दिन की देरी से पहुंचा, लेकिन 1 से 6 जुलाई के बीच हुई व्यापक वर्षा से प्रदेश के अधिकांश मैदानी और बस्तर क्षेत्रों में वर्षा की कमी काफी हद तक पूरी हो गई है। आगामी 8 जुलाई तक भी राज्य में अच्छी बारिश की संभावना जताई गई है।

कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि जहां नर्सरी तैयार है, वहां खेत की मचाई कर रोपाई करें। वहीं नर्सरी उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में अंकुरित बीजों को ड्रम सीडर या छिटकवां विधि से लेही पद्धति में बोएं। बुआई से पहले बीजों का कार्बेन्डाजिम तथा जैव उर्वरकों से उपचार करना भी आवश्यक बताया गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष देर से आए मानसून को देखते हुए इंद्रावती, बस्तर धान-1, छत्तीसगढ़ बारानी, एमटीयू-1010, एमटीयू-1153, एमटीयू-1156, एमटीयू-1001, विक्रम टीसीआर, छत्तीसगढ़ धान-1919, छत्तीसगढ़ तेजस्वी और महामाया जैसी शीघ्र एवं मध्यम अवधि (125-130 दिन) में पकने वाली किस्मों का चयन करना बेहतर रहेगा।

कृषि विभाग ने किसानों को 15 जुलाई तक सीधी बुआई तथा 30 जुलाई तक रोपाई और बियासी का कार्य पूरा करने की सलाह दी है। यदि किसी कारणवश विलंब हो जाए तो हरेली (12 अगस्त) तक बुआई-रोपाई करने पर भी उत्पादन में अधिक नुकसान नहीं होगा।

खरपतवार नियंत्रण को लेकर भी किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बुआई के बाद पहले 40 दिनों तक खेत को खरपतवार मुक्त रखना जरूरी है, अन्यथा उत्पादन में 50 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। समय पर निंदाई या अनुशंसित खरपतवारनाशकों के उपयोग से इस नुकसान से बचा जा सकता है।

कृषि विभाग ने बताया कि प्रदेश की प्राथमिक सहकारी समितियों में यूरिया, डीएपी, एनपीके, सिंगल सुपर फॉस्फेट और पोटाश का पर्याप्त भंडारण उपलब्ध है। किसानों से संतुलित मात्रा में उर्वरकों के उपयोग तथा किसी भी तकनीकी समस्या के लिए निकटस्थ कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि महाविद्यालय, कृषि अनुसंधान केंद्र या कृषि विभाग से संपर्क करने की अपील की गई है।

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