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स्कूलों में मंत्रोच्चार अनिवार्य है या नहीं, सरकार स्थिति स्पष्ट करे: कांग्रेस

रायपुर, 02 जुलाई 2026। छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस ने सरकारी स्कूलों में मंत्रोच्चार को लेकर सरकार से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि यदि हाईकोर्ट ने यह कहा है कि स्कूलों में मंत्रोच्चार अनिवार्य किए जाने संबंधी आदेश का कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया, तो सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि शिक्षा विभाग द्वारा जारी बताए जा रहे आदेश वास्तविक हैं या नहीं।

सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि मीडिया में स्कूलों में दीप मंत्र, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र, भोजन मंत्र, गायत्री मंत्र और शांति मंत्र के वाचन संबंधी आदेश तथा शिक्षा मंत्री के बयान भी सामने आए हैं। ऐसे में सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वास्तव में ऐसा कोई निर्णय लिया गया है या नहीं।

कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार स्कूलों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शाखा में बदलने का प्रयास कर रही है। पार्टी का कहना है कि सरकारी स्कूलों में विभिन्न मंत्रों का अनिवार्य वाचन संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के विपरीत है।

सुशील आनंद शुक्ला ने संविधान के अनुच्छेद 28(1) का हवाला देते हुए कहा कि पूर्णतः राज्य वित्तपोषित शिक्षण संस्थानों में किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा या विशिष्ट धार्मिक प्रार्थना आयोजित नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 28(3) के अनुसार राज्य से सहायता प्राप्त संस्थानों में भी किसी छात्र को उसकी या उसके अभिभावकों की सहमति के बिना धार्मिक प्रार्थना में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि सरकारी और अर्द्ध-सरकारी स्कूलों में विभिन्न धर्मों और समुदायों के छात्र अध्ययनरत हैं। ऐसे में किसी एक धार्मिक परंपरा से जुड़े मंत्रों का अनिवार्य वाचन धर्मनिरपेक्षता और सभी नागरिकों के समान अधिकारों के सिद्धांतों पर प्रश्न खड़ा करता है। उन्होंने आशंका जताई कि यदि ऐसा किया गया तो अन्य धर्मों के लोग भी अपनी-अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुसार प्रार्थना और धार्मिक पाठ की मांग कर सकते हैं।

कांग्रेस ने सरकार से शिक्षा व्यवस्था को धार्मिक रंग देने के बजाय वैज्ञानिक, आधुनिक और समावेशी बनाए रखने की अपील की। पार्टी का कहना है कि विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों और संस्कारों का विकास आवश्यक है, लेकिन किसी भी धार्मिक परंपरा को अनिवार्य रूप से थोपना उचित नहीं होगा।

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