
बच्चे की दुनिया को समृद्ध बनाने के कई छोटे-छोटे तरीके हैं। उनमें सबसे अच्छा तरीका है—पढ़ने का आनंद।

सुश्री अर्चना शर्मा अवस्थी एवं श्री युवराज मलिक
भारत में शिक्षा की चर्चा लंबे समय तक स्कूलों, किताबों और डिजिटल संसाधनों तक पहुंच बढ़ाने पर केंद्रित रही है। ये सभी प्रयास जरूरी हैं, लेकिन अब एक महत्वपूर्ण सवाल हमारे सामने है—क्या हम ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं, जो पढ़ने की आदत को अपने जीवन का हिस्सा बनाए?
इसी सोच के साथ राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय (आरईपी) की परिकल्पना की गई है। इसका उद्देश्य केवल डिजिटल पुस्तकों का विशाल संग्रह तैयार करना नहीं, बल्कि घर, स्कूल और समुदाय में पढ़ने की संस्कृति को मजबूत करना है। वर्तमान में आरईपी पर 23 भाषाओं में 7,000 से अधिक चयनित पुस्तकें उपलब्ध हैं। ये पुस्तकें अनेक प्रकाशकों के सहयोग से और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की भावना के अनुरूप उपलब्ध कराई गई हैं।
बाधाओं को दूर करना, आदत को नहीं बदलना
ग्रामीण, अर्ध-शहरी और पिछड़े क्षेत्रों के अनेक बच्चों के लिए पाठ्यपुस्तकों के अलावा अन्य किताबों तक पहुंच आज भी चुनौती है। कई जगह किताबों की दुकान दूर है और स्कूल पुस्तकालयों में पर्याप्त या नई पुस्तकें उपलब्ध नहीं होतीं। राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय इस दूरी को कम करने का प्रयास करता है।
मोबाइल, टैबलेट या अन्य उपलब्ध उपकरणों के माध्यम से बच्चे घर बैठे हजारों पुस्तकों तक पहुंच सकते हैं। खास बात यह है कि पुस्तकें केवल हिंदी और अंग्रेजी में ही नहीं, बल्कि अनेक भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हैं।
हालांकि, इसका उद्देश्य बच्चों को अधिक समय तक स्क्रीन के सामने बैठाना नहीं है। असल उद्देश्य उपलब्ध डिजिटल उपकरणों का उपयोग सार्थक और सामूहिक पठन अनुभव के लिए करना है।
माता-पिता छोटे बच्चों को किताबें पढ़कर सुना सकते हैं। बड़े भाई-बहन छोटे बच्चों को कहानियां सुना सकते हैं। परिवार कुछ समय साथ बैठकर पढ़ सकता है। इस तरह स्क्रीन, जो कई बार लोगों को एक-दूसरे से दूर करती है, वही परिवार को जोड़ने का माध्यम भी बन सकती है।
पढ़ना बने स्क्रीन टाइम नहीं, पारिवारिक समय
पढ़ना केवल शैक्षणिक गतिविधि नहीं है। यह सामाजिक और भावनात्मक विकास का भी माध्यम है। जब परिवार के सदस्य या दोस्त साथ पढ़ते हैं, तो बातचीत, कल्पना, सहानुभूति और विचार-विमर्श के लिए अवसर पैदा होता है।
बच्चों को पढ़कर सुनाने और उन्हें बड़ों को पढ़ते हुए देखने से उनकी भाषा और समझ विकसित होती है। साथ ही उनकी कल्पनाशक्ति और आंतरिक दुनिया भी समृद्ध होती है।
राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय अंतरपीढ़ी संवाद को भी बढ़ावा दे सकता है। बच्चे अपने दादा-दादी और नाना-नानी को पढ़कर सुना सकते हैं। किशोर अपने परिवार के बड़ों की पसंदीदा कहानियां पढ़ सकते हैं। इससे पढ़ना केवल अकेले किया जाने वाला काम नहीं रह जाता, बल्कि ‘मेरा समय’ के साथ ‘हमारा समय’ भी बन जाता है।
स्कूलों और शिक्षकों की भूमिका अहम
राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय के अगले चरण में शिक्षकों, पुस्तकालयाध्यक्षों और स्कूलों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। शिक्षक केवल पढ़ाने वाले नहीं, बल्कि पढ़ने की संस्कृति विकसित करने वाले मार्गदर्शक भी हैं।
स्कूलों में आरईपी के प्रभावी उपयोग के लिए पुस्तकालयों को सक्रिय ज्ञान केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। कहानी सुनाने और सामूहिक पठन सत्र आयोजित किए जा सकते हैं। शिक्षक अपनी पसंदीदा किताबें विद्यार्थियों के साथ साझा कर सकते हैं। विद्यार्थियों के नेतृत्व में पुस्तक चर्चा और पठन समूह बनाए जा सकते हैं।
पढ़ने को स्कूल की दैनिक दिनचर्या का स्वाभाविक हिस्सा बनाने के साथ विभिन्न लेखन विधाओं से विद्यार्थियों को परिचित कराना भी जरूरी है। इससे उनकी भाषा और लेखन क्षमता में सुधार होगा।
जीवंत और विकसित होता पुस्तकालय
पारंपरिक पुस्तकालयों की तुलना में राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय का स्वरूप गतिशील है। इसका संग्रह समय के साथ अपडेट किया जा सकता है। महत्वपूर्ण और प्रासंगिक पुस्तकों को जोड़ा जा सकता है तथा पाठकों की जरूरत के अनुसार संग्रह को विकसित किया जा सकता है।
इसका बहुभाषी स्वरूप भी इसकी बड़ी विशेषता है। बच्चे जिस भाषा में सहजता से सोचते हैं, उसी भाषा में पढ़ने से उनका सीखने का अनुभव अधिक स्वाभाविक बनता है। 23 भाषाओं में पुस्तकों की उपलब्धता भारत की भाषाई विविधता को सम्मान देती है।
आठ वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए माता-पिता और शिक्षकों को कहानियां जोर से पढ़कर सुनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इससे कम उम्र में ही पढ़ने के प्रति रुचि और जिज्ञासा विकसित की जा सकती है।
पढ़ने की संस्कृति बनाना सामूहिक जिम्मेदारी
राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय की सफलता केवल डाउनलोड या पंजीकृत उपयोगकर्ताओं की संख्या से तय नहीं होगी। वास्तविक सफलता तब होगी, जब पढ़ना फिर से घरों, स्कूलों और समुदायों की नियमित आदत बने।
भारत सदियों से कहानियों और साहित्य की समृद्ध परंपरा वाला देश रहा है। हिंदी, संस्कृत, तमिल, बंगाली, मराठी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में साहित्य की विशाल विरासत मौजूद है। आज चुनौती कहानियों की कमी नहीं, बल्कि उन्हें खोजने, पढ़ने और समझने के लिए समय निकालने की है।
राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय इसी आदत को फिर से मजबूत करने का प्रयास है। प्लेटफॉर्म पर ‘राष्ट्रीय काव्य उत्सव’ जैसी गतिविधियां आयोजित की जाती हैं और नागरिकों को कहानी सुनाने जैसी गतिविधियों में भाग लेने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में—“जब नागरिक पढ़ते हैं, तो देश आगे बढ़ता है।”
इसलिए जरूरी है कि किताबें केवल अलमारियों तक सीमित न रहें। वे फिर से घर के बैठक कक्ष में आएं, परिवार को जोड़ें, बच्चों की कल्पना को उड़ान दें और पढ़ने को जीवन का आनंद बनाएं।
राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय ndl.education.gov.in/home पर तथा एंड्रॉयड और आईओएस प्लेटफॉर्म पर निःशुल्क उपलब्ध है।
लेखक परिचय: सुश्री अर्चना शर्मा अवस्थी भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग में अपर सचिव हैं। श्री युवराज मलिक नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया के निदेशक हैं।




