जैविक खेती से आत्मनिर्भर बनीं एरिन भगत, प्राकृतिक कृषि से घटी खेती की लागत

जैविक खेती से आत्मनिर्भर बनीं एरिन भगत, प्राकृतिक कृषि से घटी खेती की लागत
जीवामृत और वर्मी कम्पोस्ट के उपयोग से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम, कृषि विभाग के मार्गदर्शन से मिली नई दिशा
रायपुर, 26 जुलाई 2026। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में कृषि विभाग द्वारा जैविक एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के प्रयास किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रहे हैं। विकासखंड सीतापुर के ग्राम पेटला की कृषक एरिन भगत ने कृषि विभाग के मार्गदर्शन में जैविक खेती अपनाकर खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी लाई है और आत्मनिर्भर कृषि का प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है।
कृषि विभाग से प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन प्राप्त करने के बाद एरिन भगत ने अपने खेतों में जीवामृत और वर्मी कम्पोस्ट का नियमित उपयोग शुरू किया। विभाग की ओर से जीवामृत तैयार करने के लिए विशेष ड्रम उपलब्ध कराया गया, जिसकी मदद से वे गाय के मूत्र से जीवामृत तैयार करती हैं। वहीं, गाय के गोबर से वर्मी कम्पोस्ट बनाकर खेतों में उपयोग कर रही हैं।
रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता हुई कम
एरिन भगत वर्तमान में पूरी तरह जैविक खेती कर रही हैं। इसके साथ ही वे वर्मी कल्चर के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण जैविक खाद का उत्पादन भी कर रही हैं। इससे रासायनिक उर्वरकों पर उनकी निर्भरता काफी कम हुई है, जिसके कारण खेती की लागत में कमी आई है और उत्पादन प्रणाली अधिक टिकाऊ बनी है।
उन्होंने बताया कि पहले रासायनिक उर्वरकों पर अधिक खर्च करना पड़ता था, लेकिन अब प्राकृतिक संसाधनों से तैयार जैविक खाद के उपयोग से आर्थिक बचत हो रही है। साथ ही भूमि की उर्वरा शक्ति भी बनी हुई है, जिससे भविष्य में बेहतर उत्पादन की संभावनाएं बढ़ी हैं। उनका मानना है कि जैविक खेती किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
कृषि विभाग दे रहा तकनीकी मार्गदर्शन
कृषि विभाग किसानों को जैविक खेती, जीवामृत निर्माण, वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन और प्राकृतिक कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगातार कार्य कर रहा है। विभाग के वैज्ञानिक मार्गदर्शन और तकनीकी सहयोग से जिले के किसान कम लागत, पर्यावरण अनुकूल और टिकाऊ खेती की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।


