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छत्तीसगढ़ की बोलियाँ मुकुट में जड़ित रत्न मणियाँ होती हैं-  शकुंतला तरार

हर बोली का अपना अनूठा लहजा, लोकगीत और शब्दकोश होता है

रायपुर, 03 अप्रैल 2026/ भाषा जहाँ माथे का मुकुट होती है तो वहीं छत्तीसगढ़ की बोलियाँ उस मुकुट में जड़ित रत्न मणियाँ होती हैं जो भाषा रूपी मुकुट को सुंदरता और मजबूती प्रदान करती हैं। साहित्य अकादमी दिल्ली एवं संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित कार्यक्रम में श्रीमती शकुंतला तरार ने छत्तीसगढ़ की बोलियों पर उनके संरक्षण, संवर्धन और विस्तार पर अपने सारगर्भित विचार प्रकट करते हुए कहा। श्रीमती शकुंतला छत्तीसगढ़ की इकलौती महिला साहित्यकार हैं, जो विगत 2014 से अकादमी के कार्यक्रमों में छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़ी और विविध लोक भाषा बोलियों पर अपनी बात मजबूती से रखती आई हैं। साहित्य अकादमी और संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा नई दिल्ली द्वारा ‘साहित्योत्सव 2026’ का आयोजन 30 मार्च से 4 अपै्रल तक आयोजित किया जा रहा है। ‘साहित्योत्सव 2026’ का शुभारंभ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष श्री माधव कौशिक ने 30 मार्च रवींद्र भवन परिसर में किया। इस साहित्योत्सव में 100 से अधिक सत्रों में 650 से अधिक प्रसिद्ध लेखक और विद्वान सहभागिता कर रहे हैं, इसमें देश की 50 से अधिक भाषाओं का भी प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इस दौरान 1 और 2 अप्रैल को कई महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्यक्रम, परिचर्चाएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम, विशेष रूप से वंदे मातरम् के 150 वर्ष पर केंद्रित था। श्रीमती तरार ने कहा कि भाषा के अंतर्गत आने वाली विभिन्न क्षेत्रीय बोलियाँ (जैसे छत्तीसगढ़ी, सरगुजिहा, हल्बी, सादरी, गोंडी, कुडुख, भतरी, बंजारी, मुरिया, माड़िया, धुरवा, दोरला, कोरवा, बैगानी, भुंजिया, धनवारी, सावरा आदि) उस मुकुट में जड़ी हुई रत्नों या मणियों के समान हैं। जिस प्रकार रत्न मुकुट की शोभा और मूल्य बढ़ाते हैं, उसी प्रकार बोलियाँ मूल भाषा को समृद्ध, जीवंत और विविधतापूर्ण बनाती हैं। एक रत्न की अपनी चमक और विशेषता होती है, वैसे ही हर बोली का अपना अनूठा लहजा, लोकगीत और शब्दकोश होता है, जो भाषा को अधिक प्रभावशाली और समृद्ध बनाता है। श्रीमती शकुन्तला तरार ने अपने वक्तव्य में बताया कि मिनिस्ट्री ऑफ ट्राईबल अफेयर्स के - द्वारा छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में कुल मिलाकर -18 स्थानीय बोलियों में कक्षा 1 से 5 तक शिक्षा का प्रावधान किया गया है, जिनमें छत्तीसगढ़ी, सरगुजिहा, हल्बी, सादरी, गोंडी, कुडुख, भतरी, बंजारी, मुरिया, माड़िया, धुरवा, दोरला, कोरवा, बैगानी, भुंजिया, धनवारी, सावरा आदि बोलियाँ हैं। अतः संभवतः इन सभी बोलियों का मानकीकरण किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि बोलियाँ समाज का दर्पण होती हैं। श्रीमती शकुंतला तरार ने पद्म विभूषण तीजन बाई का उदाहरण देते हुए कहा कि पद्म विभूषण से सम्मानित पंडवानी गायिका तीजन बाई ने पुरुष प्रधान पंडवानी कला में नई जान फूंकी। वे कापालिक शैली की पहली महिला कलाकार हैं, जिन्होंने महाभारत की कथा को नाटकीय रूप में गाया। उनके चेहरे की भाव भंगिमा, उसका प्रस्तुतिकरण का ढंग भी भाषा बोली को समृद्ध बनाते हैं, अन्यथा छत्तीसगढ़ी न जानने वाले भी पंडवानी सुनकर उसके प्रवाह में बह नहीं जाते। श्रीमती शकुंतला तरार को उनकी इस उपलब्धि के लिए साहित्यकारों, भाषाविदों ने बधाई दी है।

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