मुर्गी पालन के व्यवसाय से जुड़कर महिला समूह हुई आत्मनिर्भर, कुछ माह में मुर्गी बेचकर कमाए लाखों रूपए


महात्मा गांधी नरेगा योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन बिहान के साथ कृषि विज्ञान केन्द्र एवं पशु पालन विभाग के संयुक्त प्रयास का दिखने लगा सुखद परिणाम
कवर्धा, 12 जनवरी 2021। विभिन्न शासकीय योजनाओं के बेहतर तालमेल से मिलने वाला परिणाम हमेशा सुखद ही रहता है। जिसकी एक बानगी विकासखण्ड कवर्धा के ग्राम पंचायत पर्थरा में जय बुढ़ादेव महिला स्व.सहायता समूह की महिलाओं द्वारा मुर्गी पालन व्यवसाय के रूप में देखा जा सकता है। ऐसे ग्रामीण महिलाएं जो प्रतिदिन अपने घरेलू कार्यो में व्यस्थ रहते हुए बाहर दूसरे के खेत में रोजी-मजदूरी करना जिनका दिनचर्या रहा उससे थोड़ी बहुत आमदनी हुआ करती थी। ऐसी बारह महिलाओं को एक साथ संगठित कर व्यवसाय से जोड़ने के लिए प्रोत्साहित करने का काम राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान‘ योजना के द्वारा किया गया। मुर्गी पालन व्यवसाय के लिए लगने वाले पोल्ट्री फार्म भवन को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के द्वारा सामुदायिक पोल्ट्री फार्म भवन के रूप में पुरा किया गया। जिसमें महिला समूह के लिए कडकनाथ मुर्गी पालन, बकरी शेड, पशु शेड, वर्मी टेंक का कार्य कराया गया जिसमें क्रमशः 374 दिन, 889 दिन, 712 दिन एवं 678 दिवस सहित कुल 2653 मानव दिवस रोजगार का भी सृजन किया गया। इन सभी कार्यो के लिए महात्मा गांधी नरेगा योजना से 30 लाख 91 हजार रूपए स्वीकृति किया गया था। जिसमे 4 लाख 91 हजार रुपए मजदूरी पर व्यय किया गया तथा शेष बचे राशि का उपयोग सामग्रियों में किया गया। विभिन्न प्रजाति के मुर्गो के लालन-पालन एवं रख-रखाव की जानकारी तथा अन्य आवश्यक जरूरी व्यवस्थाओं की पूर्ति कृषि विज्ञान केन्द्र कवर्धा तथा पशुपालन विभाग द्वारा किया गया। इस तरह एक छत के नीचे शासन के विभिन्न विभाग ने साथ में मिलकर महिलाओं के आजीविका संर्वधन की नई राह खोल दी।
जय बुढ़ा देव महिला स्व सहायता समूह, की महिलाएं मुर्गी पालन के द्वारा निरंतर लाभ कमा रहीं है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन बिहान योजना के अवधरणा अनुसार ग्रामीण महिलाएं आर्थिक स्वलंबन की ओर निरंतर बढ़ रहीं है। कड़कनाथ, काकरेल, देशी जैसे विभिन्न प्रजाती के मुर्गी पालन से महिला समूह द्वारा गत् 6 से 7 माह में 100525 रूपए की आमदनी अर्जित की गई है। जय बुढ़ा देव महिला समूह कि अध्यक्ष श्रीमती कुन्ती नेताम ने बताया कि बिहान के तहत हम महिलाएं एक समूह के रूप में जुड़ी है। उन्होंने बताया कि समूह के सदस्यों ने मुर्गी पालन व्यवसाय करने का मन बनाया और हमारे भवन के आवश्यकता की पूर्ति महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ने पूरा किया। जिसमें एक सामुदायिक मुर्गी पालन शेड बन कर प्राप्त हुआ। कृषि विज्ञान केन्द्र एवं पशु चिकित्सा विभाग द्वारा मुर्गी पालन की बारीकियों से समूह के सभी सदस्यों को निरंतर प्रशिक्षित किया जा रहा है और समय-समय पर हमारा ज्ञानवर्धन कर रहें है। श्रीमती कुन्ती नेताम बताया कि हमारे केन्द्र से 325 नग देशी मुर्गी 36000 रूपए मूल्य का, 690 काकरेल मुर्गी 64525 रूपए का कुल 1015 मुर्गी का विक्रय कर 100525 रूपए का आमदनी हुई है। जिसमें हम सभी महिला समूह ने मिल कर काम किया है और लाभान्श का बराबर हिस्सा रखे है। उन्होंने बताया कि व्यवसाय शुरू करने के लिए 1 लाख रूपये का बैंक ऋण लेकर काम शुरू किया गया था, जिसका ब्याज बैंक को चूका रहें है। वर्तमान में 100 नग कड़कनाथ, 300 नग काकरेल एवं 500 नग देशी मुर्गी हमारे पोल्ट्री फार्म में तैयार हो रहीं है। आस-पास के क्षेत्र से बहुत से लोग आकर मुर्गी ले जाते है तथा विशेष रूप से कड़कनाथ का ज्यादा मांग है तथा कड़कनाथ 800 से 900 रूपए प्रति किलो, देशी 300 रूपए किलो एवं काकरेल 200 रूपए की दर से बीक रहा है। वहीं समूह कि सचिव श्रीमती ललिता पोर्ते ने बताया कि जब से हम मुर्गी पालन के काम से जुड़ी है बाहर किसी और काम करने कि आवश्यकता नहीं पड़ती। बारह सदस्यी समूह में सब ने अपना-अपना काम बाट रखा है। कोई साफ-सफाई देखता है तो कोई मुर्गी बिक्री का काम देखता है तो कोई हिसाब रखने का काम देखता हैं। प्रतिदिन 2000-3000 रूपये कि मुर्गी विक्रय हो जाती है।
कृषि विज्ञान केन्द्र कवर्धा के वरिष्ट विज्ञानिक एवं प्रमुख श्री बी. पी. त्रिपाठी ने बताया कि कड़कनाथ नस्ल पूरे भारत वर्ष में कालामासी (काला मांस) के नाम से प्रचलित है, इस मांस में सभी पक्षी मांस की अपेक्षा औषधीय गुण अधिक होती है। जिसमें प्रोटिन कि मात्रा 25 प्रतिशत जबकि अन्य पक्षियों में 18-20 होता है। हृदय रोगी भी इसका मांस बिना झिझक के खा सकतें है, क्योकि इसमें वसा की मात्रा 0.73-1.03 प्रतिशत जबकि अन्य पक्षियों में 13-25 प्रतिशत तक पाया जाता है। साथ ही कड़कनाथ में कोलोस्ट्राल की मात्रा 184.75 प्रतिशत मिली ग्राम/100 ग्राम जबकि अन्य में 218.12 मिली ग्राम /100 ग्राम पाया जाता है। इस नस्ल के अनेकों गुण के साथ साथ रोग प्रतिकारक क्षमता अन्य पक्षियों कि अपेक्षा कम होती है। कवर्धा के जलवायु में इस नस्ल को आसानी से पाला जा सकता है। इसीलिए समुदाय में बैकयार्ड कूकुट को बढ़ावा देने के लिए यह नस्ल उपयुक्त है।
विभागीय योजनाओ के अभिसरण का सफल मॉडलः सीईओ

जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री विजय दयाराम के. ने पर्थरा स्थित जय बुढ़ा देव महिला स्व सहायता समूह के संबंध में बताया कि पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की अगुवाई में कृषि विज्ञान केन्द्र कवर्धा एवं पशु पालन विभाग के संयुक्त प्रयास से महिलाएं आत्मनिर्भर हुई है। विभागीय योजनाओं का अभिसरण कारगर सिद्ध हुआ है। महात्मा गांधी नरेगा योजना से भवन बनाकर दिया गया। बिहान योजना के माध्यम से महिला समूह का गठन किया गया, कृषि विज्ञान केन्द्र एवं पशु पालन विभाग द्वारा मुर्गी पालन करने जैसे तमाम आवश्यकता कि पूर्ति की गई इस तरह यह कार्य पूर्ण होकर आगे बढ़ा। उन्होंने बताया कि महिला समूह को मुर्गी पालन से संबंधित तकनिकी जानकारी निरंतर उपलब्ध करायी जा रही है। जिसका परिणाम है की बहुत कम समय में समूह ने लाख रूपए से ज्यादा की आमदनी अर्जित की है जिसके कारण ग्रामीण महिलाएं आर्थिक स्वालंबन की ओर तेजी से बढ़ी है।
