आदिवासी समुदायों तक न्याय की पहुंच मजबूत करने पर एचएनएलयू में मंथन

संवैधानिक संरक्षण, वन अधिकार और ग्राम सभा की भूमिका पर विशेषज्ञों ने की चर्चा; ‘आरण्यका’ शोध पत्रिका का पहला अंक जारी
रायपुर, 10 अगस्त 2026। हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एचएनएलयू), रायपुर में आदिवासी समुदायों तक न्याय की प्रभावी पहुंच सुनिश्चित करने के मुद्दे पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर लॉ एंड इंडिजिनस पीपल ने सेंटर फॉर कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ एंड फेडरलिज्म के सहयोग तथा सीजी लर्न कार्यक्रम के अंतर्गत “ऑडिटिंग एक्सेस टू जस्टिस फॉर इंडिजिनस कम्युनिटीज: मेजरिंग इनक्लूजन, अकाउंटेबिलिटी एंड ट्रांसफॉर्मेटिव जस्टिस” विषय पर कार्यशाला आयोजित की।
कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। न्यायपालिका, शिक्षाविदों, विधि विशेषज्ञों, अधिवक्ताओं, शोधकर्ताओं, नागरिक समाज संगठनों और विद्यार्थियों ने कार्यशाला में भाग लिया।
कमजोर वर्गों के दृष्टिकोण से हो न्याय तक पहुंच का आकलन
एचएनएलयू के कुलपति प्रोफेसर (डॉ.) वी.सी. विवेकानंदन ने कहा कि न्याय तक पहुंच का आकलन समाज के सबसे कमजोर वर्गों के दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए। उन्होंने आदिवासी समुदायों के लिए सामुदायिक न्याय फेलो, आदिवासी भाषाओं में कानूनी नोटिस के एआई आधारित अनुवाद, विधिक स्वास्थ्य क्लीनिक, मोबाइल संवैधानिक कारवां और आदिवासी ज्ञान परिषद जैसी पहल शुरू करने का सुझाव दिया।
मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा ने न्याय तक पहुंच को “सस्ता, सुलभ और स्वच्छ न्याय” की अवधारणा से जोड़ते हुए कहा कि न्याय व्यवस्था को समुदायों की सांस्कृतिक विशेषताओं और स्थानीय परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। उन्होंने आदिवासी समुदायों के लिए न्यायिक प्रक्रिया को अधिक सुगम, जवाबदेह और समुदाय-केंद्रित बनाने पर जोर दिया।
वन अधिकार और ग्राम सभा की भूमिका पर चर्चा
कार्यशाला के तकनीकी सत्रों में अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक संरक्षण, आवासीय एवं वन अधिकार, ग्राम सभा की भूमिका, सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण तथा न्यायिक उपचार जैसे विषयों पर चर्चा हुई। आदिवासी समुदायों के सामने न्यायिक उपचार और राज्य की संस्थाओं तक पहुंच बनाने में आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों पर भी विशेषज्ञों ने विचार रखे।
कार्यक्रम में रायपुर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव अविनाश दुबे, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबई के डीन डॉ. गीतांजॉय साहू सहित विभिन्न संस्थानों के विशेषज्ञ और संसाधन व्यक्ति शामिल हुए।
‘आरण्यका’ के प्रथम अंक का विमोचन
कार्यशाला का प्रमुख आकर्षण ‘आरण्यका’ शोध पत्रिका के प्रथम अंक का औपचारिक विमोचन रहा। यह सहकर्मी-समीक्षित शोध पत्रिका विधि, आदिवासी समुदायों, संवैधानिक शासन, पारिस्थितिकी और परिवर्तनकारी न्याय से जुड़े शोध एवं अकादमिक विमर्श को समर्पित है।
कार्यशाला के समापन पर भारत में अधिक समावेशी, जवाबदेह और परिवर्तनकारी न्याय व्यवस्था के लिए शोध सहयोग, विधिक साक्षरता कार्यक्रमों, समुदाय-केंद्रित न्याय तंत्र और नीति-निर्माण में प्रभावी सहभागिता को मजबूत करने पर जोर दिया गया।


