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सफेद सोने की कहानी: खेत से शर्ट तक भारत के कपास की वैश्विक उड़ान

60 लाख किसानों की आजीविका का आधार कपास, उत्पादन से लेकर ब्रांडिंग तक बदल रहा है पूरा परिदृश्य

नई दिल्ली।
भारत की कृषि और औद्योगिक अर्थव्यवस्था में कपास का स्थान बेहद महत्वपूर्ण है। खेतों में उगने वाला यह सफेद रेशा केवल एक फसल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका, वस्त्र उद्योग की मजबूती और देश की आर्थिक प्रगति का आधार है। यही वजह है कि कपास को भारत में “सफेद सोना” कहा जाता है। बीज से शुरू होने वाली कपास की यात्रा कताई मिलों, कपड़ा उद्योग और फैशन बाजारों तक पहुंचकर वैश्विक पहचान बनाती है।

भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जहां कपास की चारों मान्यता प्राप्त प्रजातियों की खेती की जाती है। क्षेत्रफल के लिहाज से भारत कपास उत्पादन में विश्व में पहले स्थान पर है, जबकि उत्पादन और खपत के मामले में दूसरे स्थान पर है। वर्ष 2025-26 में देश में कपास उत्पादन 290.91 लाख गांठ रहने का अनुमान है, जबकि घरेलू खपत 328 लाख गांठ तक पहुंच गई है।

60 लाख किसानों की जिंदगी से जुड़ी है कपास

कपास देश के करीब 60 लाख किसानों की आजीविका का प्रमुख आधार है। इसके अलावा कपास प्रसंस्करण, कताई, बुनाई, वस्त्र निर्माण और व्यापार से जुड़े करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता है। कपास से बने धागे, कपड़े और तैयार परिधान भारत के निर्यात में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

भारत का कपास क्षेत्र अपनी जैव विविधता, विशाल खेती क्षेत्र और मजबूत वस्त्र उद्योग के कारण वैश्विक स्तर पर विशेष पहचान रखता है। सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य, कपास उत्पादकता मिशन और कस्तूरी कॉटन भारत जैसी योजनाओं के माध्यम से इस क्षेत्र को नई दिशा दी जा रही है।

स्वदेशी आंदोलन से आत्मनिर्भर भारत तक

भारत और कपास का संबंध हजारों वर्षों पुराना है। प्राचीन काल में भारतीय सूती वस्त्रों की मांग दुनिया भर में थी। भारत के कपड़े यूरोप और अन्य देशों तक निर्यात किए जाते थे।

आधुनिक कपड़ा उद्योग ने 19वीं शताब्दी में मुंबई, कोलकाता और अहमदाबाद जैसे शहरों में आकार लेना शुरू किया। अहमदाबाद को इसी कारण “भारत का मैनचेस्टर” कहा जाने लगा। स्वदेशी आंदोलन के दौरान भारतीय कपड़ा उद्योग को मजबूती मिली और आत्मनिर्भरता की भावना को बढ़ावा मिला।

चार प्रजातियों की खेती करने वाला दुनिया का एकमात्र देश

भारत में कपास की चार प्रमुख प्रजातियों की खेती होती है। इनमें एशियाई कपास, मिस्र की कपास और अमेरिकी अपलैंड कपास शामिल हैं। देश में उगाई जाने वाली अधिकांश संकर कपास जी. हिरसुटम प्रजाति से संबंधित है।

वर्ष 2002 में भारत में बीटी कपास की व्यावसायिक शुरुआत हुई। इसमें बैसिलस थुरिंगिएन्सिस नामक जीवाणु के जीन शामिल किए गए हैं, जिससे कपास की फसल को बॉलवर्म जैसे प्रमुख कीटों से सुरक्षा मिलती है। इससे किसानों को उत्पादन बढ़ाने और कीटनाशक खर्च कम करने में मदद मिली।

देश के नौ राज्यों में प्रमुख उत्पादन

भारत में कपास उत्पादन मुख्य रूप से नौ राज्यों में होता है।

  • उत्तरी क्षेत्र: पंजाब, हरियाणा और राजस्थान
  • मध्य क्षेत्र: गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश
  • दक्षिणी क्षेत्र: तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक

इसके अलावा ओडिशा और तमिलनाडु में भी कपास की खेती की जाती है।

भारत में कपास की खेती का बड़ा हिस्सा वर्षा आधारित है। लगभग 62 प्रतिशत क्षेत्र में बारिश के भरोसे कपास उत्पादन होता है, जबकि 38 प्रतिशत क्षेत्र सिंचित है।

किसानों को एमएसपी का सहारा

कपास किसानों को बाजार में उचित मूल्य दिलाने के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व्यवस्था संचालित करती है। बाजार भाव एमएसपी से नीचे आने पर भारतीय कपास निगम (सीसीआई) किसानों से कपास की खरीद करता है।

कपास वर्ष 2025-26 के लिए मध्यम रेशा कपास का एमएसपी 7,710 रुपए प्रति क्विंटल और लंबे रेशा कपास का एमएसपी 8,110 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया था।

सीसीआई द्वारा एमएसपी खरीद व्यवस्था को मजबूत करने के लिए देशभर में खरीद केंद्रों का विस्तार किया गया है। इससे किसानों को बाजार में मूल्य सुरक्षा मिल रही है।

उत्पादकता बढ़ाने के लिए कपास मिशन

कपास क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने और किसानों की आय मजबूत करने के लिए वर्ष 2025-26 में पांच वर्षीय कपास उत्पादकता मिशन शुरू किया गया है। इस मिशन के लिए 5,659 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है।

इसका लक्ष्य बेहतर बीज, आधुनिक तकनीक, जलवायु अनुकूल खेती और अतिरिक्त लंबे रेशे वाली कपास के उत्पादन को बढ़ावा देना है। मिशन के तहत वर्ष 2031 तक कपास उत्पादन को 498 लाख गांठ तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।

कस्तूरी कॉटन भारत से बढ़ेगी पहचान

भारतीय कपास की गुणवत्ता और वैश्विक पहचान बढ़ाने के लिए “कस्तूरी कॉटन भारत” पहल शुरू की गई है। इसके माध्यम से कपास की ट्रेसबिलिटी, गुणवत्ता प्रमाणन और ब्रांडिंग पर जोर दिया जा रहा है।

क्यूआर कोड आधारित प्रमाणन और ब्लॉकचेन तकनीक के माध्यम से कपास की पूरी आपूर्ति श्रृंखला पर निगरानी रखी जा रही है। इससे भारतीय कपास को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर पहचान मिलने की उम्मीद है।

कपास सिर्फ कपड़ा नहीं, कई उपयोगों का आधार

कपास से केवल कपड़े ही नहीं बनते, बल्कि इसके कई उप-उत्पाद भी उपयोगी होते हैं। कपास के बीज से तेल निकाला जाता है, जबकि बची हुई खली पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल होती है।

कपास के छोटे रेशों से चिकित्सा क्षेत्र में उपयोग होने वाली सर्जिकल कॉटन बनाई जाती है। वहीं कपास के डंठल ग्रामीण क्षेत्रों में ईंधन के रूप में उपयोग किए जाते हैं।

भविष्य की ओर बढ़ता कपास क्षेत्र

भारत की कपास कहानी परंपरा और आधुनिक तकनीक के मेल की कहानी है। खेतों से शुरू होकर वैश्विक बाजार तक पहुंचने वाला यह सफेद रेशा देश की कृषि, उद्योग और व्यापार को जोड़ता है।

नई तकनीक, बेहतर बाजार व्यवस्था, गुणवत्ता सुधार और किसान हितैषी योजनाओं के साथ भारतीय कपास आने वाले वर्षों में वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।

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