G-QKE15KJ9P0 25777229988609873
ChhattisgarhGujaratINDIARaipurखास-खबर

कोचरब आश्रम: जहां बैरिस्टर मोहनदास ने शुरू की थी ‘महात्मा’ बनने की यात्रा

सत्याग्रह, सामाजिक समरसता और आत्मानुशासन की पहली प्रयोगशाला, आज भी सहेज रहा गांधी के विचारों की विरासत

अहमदाबाद।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में साबरमती आश्रम का नाम सबसे पहले लिया जाता है, लेकिन उससे पहले एक ऐसा स्थान भी था, जिसने मोहनदास करमचंद गांधी के विचारों, सत्याग्रह और सामाजिक सुधारों की नींव तैयार की। अहमदाबाद के पालडी क्षेत्र स्थित कोचरब आश्रम वही ऐतिहासिक स्थल है, जहां दक्षिण अफ्रीका से लौटे बैरिस्टर गांधी ने भारत में अपने सिद्धांतों का पहला प्रयोग किया और यहीं से उनके ‘महात्मा’ बनने की यात्रा प्रारंभ हुई।

पत्र सूचना कार्यालय, रायपुर द्वारा आयोजित पत्रकारों के अध्ययन भ्रमण के दौरान कोचरब आश्रम के प्रबंधक डॉ. प्रसन्ना गांधी ने बताया कि वर्ष 1915 में स्थापित यह आश्रम केवल रहने का स्थान नहीं था, बल्कि सत्याग्रह, आत्मशुद्धि, सामुदायिक जीवन और सामाजिक सुधारों की पहली प्रयोगशाला था। दक्षिण अफ्रीका के फीनिक्स सेटलमेंट और टॉल्स्टॉय फार्म में मिले अनुभवों को गांधीजी ने भारत में पहली बार यहीं मूर्त रूप दिया।

गोखले की सलाह पर अहमदाबाद को चुना था गांधीजी ने

9 जनवरी 1915 को दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद गांधीजी ने अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर देश भ्रमण किया। आश्रम स्थापना के लिए कई स्थानों पर विचार करने के बाद उन्होंने अहमदाबाद को चुना।

इसके पीछे कारण था कि यह उनकी मातृभाषा गुजराती का प्रमुख केंद्र था, वस्त्र उद्योग का बड़ा शहर था और यहां के उद्योगपतियों से राष्ट्रीय आंदोलन को सहयोग मिलने की संभावना थी।

150 साल पुराने बंगले से शुरू हुई थी सत्याग्रह की प्रयोगशाला

कोचरब आश्रम की शुरुआत गांधीजी के मित्र एवं बैरिस्टर जीवनलाल देसाई के लगभग 150 वर्ष पुराने बंगले से हुई थी। भवन की निचली मंजिल पर आश्रमवासी रहते थे, जबकि ऊपरी मंजिल पर महत्वपूर्ण बैठकें होती थीं।

यहीं स्वतंत्रता आंदोलन की प्रारंभिक योजनाएं तैयार हुईं। आज भी यह कक्ष ‘सत्याग्रह मेमोरियल हॉल’ के रूप में संरक्षित है, जहां मूल लकड़ी का फर्श सुरक्षित रखा गया है।

वैज्ञानिक तरीके से किया गया संरक्षण

गुजरात सरकार द्वारा आश्रम का संरक्षण और पुनर्विकास कराया गया है। वर्ष 2022-23 में भवन की वैज्ञानिक तकनीकों से मरम्मत की गई। पुरानी लकड़ी, खिड़कियां, छत और दीवारों को सुरक्षित रखते हुए संरचना को मजबूती दी गई।

परिसर में संग्रहालय, प्रदर्शनी दीर्घाएं और गतिविधि केंद्र विकसित किए गए हैं, जहां गांधीजी के जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रसंगों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से दिखाया जाता है।

अस्पृश्यता के खिलाफ यहीं शुरू हुई बड़ी लड़ाई

कोचरब आश्रम सामाजिक समानता के आंदोलन का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा। गांधीजी ने आश्रम में दलित परिवार दूधाभाई, दानीबेन और उनकी पुत्री लक्ष्मी को रहने की अनुमति दी।

इस निर्णय का समाज के कुछ वर्गों ने विरोध किया और आर्थिक सहयोग भी बंद कर दिया गया। लेकिन गांधीजी अपने निर्णय पर अडिग रहे। उन्होंने कहा कि समानता और मानवता के सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

इसी कठिन समय में उद्योगपति अंबालाल साराभाई ने आर्थिक सहयोग देकर आश्रम को संकट से बाहर निकाला।

कस्तूरबा गांधी की भूमिका भी रही महत्वपूर्ण

आश्रम के संचालन में कस्तूरबा गांधी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी। गांधीजी कई विषयों पर उनसे सलाह लेते थे। आश्रम में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग आवास तथा सामूहिक रसोई की व्यवस्था थी।

यहीं तैयार हुए गांधीजी के 11 जीवन-व्रत

कोचरब आश्रम में गांधीजी ने आत्मशुद्धि और समाज निर्माण के लिए 11 व्रतों की व्यवस्था विकसित की। इनमें सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, अपरिग्रह, अस्वाद, शारीरिक श्रम, स्वदेशी, अभय, अस्पृश्यता निवारण और सर्वधर्म समभाव शामिल थे।

गांधीजी का विश्वास था कि व्यक्ति के चरित्र निर्माण से ही समाज और राष्ट्र का निर्माण संभव है।

प्लेग के बाद साबरमती आश्रम में हुआ स्थानांतरण

वर्ष 1917 में कोचरब क्षेत्र में प्लेग फैलने के बाद गांधीजी ने आश्रम को साबरमती नदी के किनारे स्थानांतरित किया। उनका मानना था कि सत्याग्रही को हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। यही सोच आगे चलकर साबरमती आश्रम की स्थापना का आधार बनी।

आज भी प्रेरणा का केंद्र है कोचरब आश्रम

आज कोचरब आश्रम संग्रहालय और गतिविधि केंद्र के रूप में नई पीढ़ी को गांधीजी के विचारों से जोड़ रहा है। यहां गांधीजी के आध्यात्मिक गुरु श्रीमद राजचंद्र, राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले तथा टॉल्स्टॉय, रस्किन और थोरो जैसे विचारकों से जुड़ी जानकारी भी प्रदर्शित की गई है।

आधुनिक सुविधाओं के साथ विकसित होने के बावजूद आश्रम के सामने गांधीवादी सादगी और आधुनिक उपयोग के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी बनी हुई है।

कोचरब आश्रम केवल एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा, समानता और सामाजिक परिवर्तन की वह भूमि है, जहां एक साधारण बैरिस्टर ने महात्मा बनने की दिशा में पहला कदम रखा था।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

You cannot copy content of this page