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एक छतरी, चार दोस्त… बारिश में स्कूल जाने का वह सुनहरा बचपन आज भी याद है- ✍️ श्रीमती संतोष ताम्रकार की कलम से

AP न्यूज़ विश्वराज ताम्रकार

दुर्ग : बारिश का मौसम और स्कूल जाने का मज़ा ही कुछ और होता था। एक ही छतरी के नीचे तीन-चार दोस्तों का साथ चलना, कोई अपनी ओर छाता खींचता तो कोई दूसरी ओर। हम भी भीगते, हमारे बस्ते भी भीग जाते, लेकिन चेहरे पर मुस्कान बनी रहती।
ड्रेस में कीचड़ लगने का डर, जूते खराब होने की चिंता और स्कूल देर से पहुँचने की घबराहट… इन सबके बीच भी हर पल आनंद से भरा होता था। सबसे बड़ी खुशी तब मिलती थी, जब तेज बारिश के कारण कक्षा में बैठने की जगह नहीं होती और छुट्टी की घंटी जल्दी बज जाती।
सचमुच, बारिश के दिनों में स्कूल जाने का जो आनंद बचपन में मिलता था, वह आज शायद कहीं खो गया है। लेकिन गांव के स्कूलों में आज भी वही मासूमियत, वही बारिश और वही बचपन अपनी सादगी के साथ जीवंत दिखाई देता है। बारिश की हर बूंद आज भी उन सुनहरे दिनों की याद ताज़ा कर देती है।

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