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मुनमुना पुलिया निर्माण में भ्रष्टाचार, उठी जांच की मांग

कवर्धा। कबीरधाम जिला अंतर्गत जनपद पंचायत पंडरिया क्षेत्र के ग्राम पंचायत मुनमुना में मनरेगा योजना के तहत कराए जा रहे पुलिया निर्माण कार्य में गंभीर अनियमितताओं एवं भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए हैं। मामले के उजागर होते ही ग्रामीणों में भारी आक्रोश व्याप्त है तथा प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण कार्य में गुणवत्ता से समझौता करते हुए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के मूल नियमों और प्रावधानों की खुलेआम अनदेखी की गई।

सूचना बोर्ड नही:-

ग्रामीणों के अनुसार निर्माण स्थल पर अनिवार्य सूचना बोर्ड तक नहीं लगाया गया, जबकि मनरेगा के पारदर्शिता नियमों के तहत प्रत्येक कार्यस्थल पर स्वीकृत लागत, कार्य अवधि, मजदूरी दर, कार्य एजेंसी एवं तकनीकी स्वीकृति संबंधी जानकारी सार्वजनिक करना आवश्यक है। सूचना बोर्ड का अभाव पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

मटेरियल गुणवत्ता की कमी:

आरोप है कि पुलिया निर्माण में मानक सामग्री के स्थान पर मिट्टी युक्त काली रेत तथा नाले से निकाले गए रेतनुमा मुरम का उपयोग कर कंक्रीट तैयार किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि घटिया सामग्री से निर्मित संरचना भविष्य में क्षतिग्रस्त हो सकती है, जिससे जनसुरक्षा पर भी खतरा मंडरा सकता है। इसे सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के साथ आम जनता की सुरक्षा से खिलवाड़ माना जा रहा है।

मशीनों का उपयोग:-

मामले का सबसे गंभीर पहलू यह बताया जा रहा है कि मनरेगा कार्यों में जहां मानव श्रम को प्राथमिकता देना अनिवार्य है, वहीं मजदूरों के स्थान पर JCB और डोजर मशीनों का उपयोग किया गया। मनरेगा दिशा-निर्देशों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में मशीनों एवं ठेकेदारी प्रणाली का उपयोग प्रतिबंधित है। ऐसे में मशीनों का उपयोग सीधे ग्रामीण श्रमिकों के रोजगार अधिकारों का हनन माना जा रहा है।

यदि जांच में शासकीय राशि के दुरुपयोग, फर्जी मस्टर रोल, घटिया निर्माण सामग्री अथवा मिलीभगत के प्रमाण मिलते हैं, तो मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधित 2018) की धाराओं के तहत भी जांच योग्य हो सकता है। ग्रामीणों का आरोप है कि तकनीकी सहायक, मनरेगा अधिकारी, सरपंच एवं रोजगार सहायक की मिलीभगत के बिना इतनी बड़ी अनियमितता संभव नहीं।
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि उच्चस्तरीय जांच टीम गठित कर तकनीकी परीक्षण एवं निर्माण सामग्री की लैब जांच कराई जाए। साथ ही दोषी पाए जाने पर तकनीकी सहायक, मनरेगा अधिकारी, सरपंच एवं रोजगार सहायक की सेवा तत्काल समाप्त कर शासकीय राशि की वसूली तथा आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस मामले में कठोर कार्रवाई कर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाएगा, या फिर जिम्मेदारों को संरक्षण देकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। पूरे क्षेत्र की नजर अब प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हुई है।

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