क्या बोरी में कानून से ऊपर हैं थाना प्रभारी सवालों के घेरे में ?

क्या बोरी में कानून से ऊपर हैं थाना प्रभारी सवालों के घेरे में ?
करन ताम्रकार धमधा/ बोरी ग्राम पंचायत में प्रस्तावित शराब दुकान को लेकर शुरू हुआ विवाद अब कानून व्यवस्था की बड़ी चुनौती बन गया है। कलेक्टर के निर्देश पर बुलाई गई विशेष ग्रामसभा, जहां लोकतांत्रिक तरीके से राय ली जानी थी, वही सभा हिंसा, अफरा-तफरी और पुलिस की कथित निष्क्रियता की मिसाल बनकर सामने आई। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में हैं थाना प्रभारी अनिल पटेल, जिनकी कार्यशैली पर अब ग्रामीणों से लेकर सामाजिक संगठनों तक ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
बहुमत विरोध में, फिर भी क्यों भड़का माहौल
ग्रामसभा में बड़ी संख्या में ग्रामीण, महिलाएं और युवा शामिल हुए। जनमत स्पष्ट था—145 ग्रामीणों ने शराब दुकान का विरोध किया, जबकि मात्र 27 लोगों ने समर्थन दिया। इसके बावजूद दुकान खोलने की चर्चा जारी रहने से गांव का माहौल तनावपूर्ण हो गया। ग्रामीणों का कहना है कि जब बहुमत विरोध में था, तब प्रशासन और पुलिस को सक्रिय होकर स्थिति संभालनी चाहिए थी।
ग्रामसभा बनी हिंसा का अखाड़ा
स्थिति उस वक्त बिगड़ गई जब ग्रामसभा के दौरान एक महिला के साथ खुलेआम मारपीट की घटना सामने आई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, महिला अपने परिजन को विरोध में हस्ताक्षर करने के लिए समझा रही थी, तभी एक व्यक्ति ने हस्तक्षेप कर उसके साथ मारपीट शुरू कर दी।
महिला गंभीर रूप से घायल हो गई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
मौके पर पुलिस मौजूद थी
इसके बावजूद तत्काल प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई
इससे पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े हो गए हैं।
थाना प्रभारी की भूमिका पर सवाल
ग्रामीणों और प्रत्यक्षदर्शियों का आरोप है कि थाना प्रभारी अनिल पटेल ने घटना के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। क्षेत्र में पहले से ही कई गंभीर आरोप लगते रहे हैं
अवैध शराब का खुलेआम कारोबार
गांजा व अन्य नशीले पदार्थों की बढ़ती बिक्री
मारपीट के मामलों में समय पर एफआईआर दर्ज न होना
ग्रामसभा की घटना ने इन आरोपों को और बल दिया है।
जवाब से बचते थाना प्रभारी
जब इस मामले में थाना प्रभारी से पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो उन्होंने संवाद से बचते हुए पत्रकार का नंबर ब्लॉक कर दिया। यह रवैया पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों पर सवाल खड़ा करता है।
उच्च अधिकारियों पर भी उठे सवाल
जिले के पुलिस अधीक्षक विजय अग्रवाल सख्त पुलिसिंग के लिए जाने जाते हैं, लेकिन बोरी की घटना ने उनके नेतृत्व पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
क्या स्थानीय शिकायतों को नजरअंदाज किया जा रहा है?
क्या थाना स्तर की लापरवाही पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही?
‘उड़ता बोरी’ की चर्चा तेज
स्थानीय लोगों के बीच “उड़ता बोरी” शब्द तेजी से प्रचलित हो रहा है, जो क्षेत्र में बढ़ती अवैध गतिविधियों की ओर संकेत करता है। ग्रामीणों का कहना है कि जब पुलिस की मौजूदगी में महिला सुरक्षित नहीं है, तो आम जनता खुद को कैसे सुरक्षित महसूस करे।
जनता की मांगें
घटना के बाद ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। उनकी प्रमुख मांगें हैं—
आरोपी पर तत्काल एफआईआर दर्ज की जाए
प्रस्तावित शराब दुकान को पूरी तरह रद्द किया जाए
थाना प्रभारी की कार्यप्रणाली की उच्च स्तरीय जांच हो
थाना प्रभारी का पक्ष
थाना प्रभारी अनिल पटेल का कहना है कि मामला आपसी समझौते से सुलझा लिया गया है। उनके अनुसार, लिखित शिकायत नहीं मिलने के कारण कार्रवाई नहीं की गई।
हालांकि, स्थलीय सूत्रों का दावा है कि एफआईआर दर्ज करने के बजाय समझौते का दबाव बनाया जा रहा है।
बोरी की यह घटना सिर्फ एक ग्रामसभा का विवाद नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष जांच कर जनता का विश्वास बहाल कर पाता है या नहीं।
