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बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक(होलिका दहन)🔥-विश्वराज ताम्रकार अध्यक्ष ब्लाक कांग्रेस सेवादल

पौराणिक मान्यताओं में फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फाल्गुन पूर्णिमा तक के समय को होलाष्टक माना जाता है, जिसमें शुभ कार्य वर्जित रहते हैं, इसी क्रम में पूर्णिमा के दिन होलिका-दहन किया जाता है, जिसके उपरांत अगले दिन रंगों का त्योहार होली मनाने का विधान है

शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु के अनन्य भक्त प्रह्लाद की प्रभु भक्ति से क्रोधित होकर उसके पिता हिरणकश्यप ने अपनी बहन होलिका जिसे अग्नि से अमरता प्रप्त थी को प्रह्लाद को गोद मे लेकर अग्नि में बैठने का आदेश दिया

प्रभुभक्ति में लीन प्रह्लाद मुस्कुराते हुए होलिका की गोद में बैठे और फिर हिरणकश्यप के आदेश पर अग्नि प्रज्वलित कर दी गई, थोड़ी देर में लोगों ने अग्नि के कोप में झुलस रही होलिका की चीत्कार सुनी जो उसमे भस्म हुई और प्रह्लाद सुरक्षित अग्नि से बाहर निकल आए

मान्यता है कि तब से लेकर आज तक बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में, हिन्दू धर्म में प्रति वर्ष प्रतीकात्मक रूप से फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन की परंपरा का निर्वहन किया जाता है ।

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