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समाज,धर्म,राजनीति,बेरोजगारी,और तर्कशास्त्र – रवि मानिकपुरी छात्र समाजशास्त्र

समाज,धर्म,राजनीति,बेरोजगारी,और तर्कशास्त्र – रवि मानिकपुरी छात्र समाजशास्त्र

AP न्यूज़: समाज में युवा वर्ग होती है ऋण की हड्डी आज
भारत में हम समाज की बात करें और वर्तमान समाज में युवा पीढ़ी को प्रभावित करने वाले मुद्दे को तर्कशास्त्र व चिंतन के विज्ञान से परीक्षण करने पर अनेकानेक समस्या उतपन्न होगा। युवा वर्ग को जिस तरह ऋण की हड्डी कही जाती है, वही आज बेकरी की पोटली बाँध फिर रही है। राजनीति शास्त्री समाज को व्यक्तियों के समूह के रूप में देखता है। मानवशास्त्री आदिम समुदायों को ही समाज मानता है, जबकि अर्थशास्त्री आर्थिक क्रियाओं को संपन्न करने वाले व्यक्तियों के समूह को समाज कहता है। अगर हम प्रत्येक समुदाय के व्यक्तियों को एक समूह के रूप में रखें तो सम्पूर्ण भारत का भाग होगा। व्यक्तियों के बिच सम्बन्धो के सवरूप को हम समाज कहते हैं।
समाज में न्याय के लिए समान बरताव के सिद्धांत का समानुपातिकता के सिद्धांत के साथ संतुलन बिठाने की ज़रूरत है। न्याय के जिस तीसरे सिद्धांत को हम समाज के लिए मान्य करते हैं, वह पारिश्रमिक या कर्त्तव्यों का वितरण करते समय लोगों की विशेष ज़रूरतों का ख्याल रखने का सिद्धांत है। धर्म और राजनीति दोनों सदियों से व्यक्ति एवं समाज पर गहरा प्रभाव डालनेवाले विषय रहे हैं। दोनों ने ही मानव सभ्यता के विकास में अहम भूमिका निभायी है और समय-समय पर मानव इतिहास को नयी दिशा भी दी है। इतिहास ने धार्मिक केंद्रों को राजनीतिक सत्ता-केंद्र के रूप में भी कार्य करते देखा है। फिर भी इन दोनों के आपसी संबंध चर्चा के मुद्दे बनते रहे हैं कभी-कभी इनकी मिथ्या-प्रस्तुति के कारण विवाद भी पैदा होते रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में इस विषय पर गहराई से चिंतन करना समीचीन है।धर्म क्या है ? शास्त्रसम्मत विचार से जिसे धारण किया जा सके वह धर्म है।स्वाभाविक रूप से धर्म वह धारणीय क्रिया है, जो हमें जीने का रास्ता दिखाती है एवं नेकी पर चलने का मार्ग प्रदर्शित करती है. वैसे हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि के संबंध में कहा जाता है कि ये धर्म नहीं संप्रदाय हैं. धर्म तो हर मनुष्य का एक ही है, वह है मानव धर्म।
क्या ? वर्तमान समाज में धर्म का राजनीति पर अधिक प्रभाव पड़ा है। यदि हम तर्कशास्त्र में देखें तो प्रश्न यह उठता है की, जब रक्तदान किया जाता है तब उस रक्त में धर्म और जाति का मुहर क्यों नही लगा दिया जाता?
ये हिन्दू का मुस्लिम का सिख का ईसाई का दलित का,
फिर धर्म के नाम पर कूटनीति क्यों ? जीवन अनमोल है इस जगत में जियो और जीने दो। आज समूचे भारतवर्ष में बढ़ती हुई शिक्षित बेरोजगारी यह प्रमाण देता है की आने वाला समय बेरोजगारों के लिए एक अभिशाप से कम नही होगा। जनसंख्या के अनुसार रोजगार के अवसर जितने सृजित किए जाने की आवश्यकता है उतने नहीं हो पा रहे हैं। नतीजतन युवा वर्ग बेरोजगारी की चक्की में पिसकर अपने लक्ष्यों से भटकता जा रहा है। सरकारी क्षेत्र में रोजगार हासिल करने के लिए बेरोजगार युवाओं को आज कितनी मशक्कत करनी पड़ रही है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। लाखों बेरोजगार युवाओं को आवेदन करने के एवज में आवश्यकता से अधिक आवेदन राशि देनी पड़ रही है। आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं के लिए इस बेरोजगार युग में रुपये जुटाना कोई आसान काम नहीं है। सरकार द्वारा की जाने वाली भर्तियों में पदों की संख्या बेरोजगारों की भीड़ को देखते हुए ऊंट के मुंह में जीरे के समान होती है। देश में बेरोजगारी के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। राजनीति उचित समय और उचित स्थान पर उचित कार्य करने की कला) अर्थात् नीति विशेष के द्वारा शासन करना या विशेष उद्देश्य को प्राप्त करना राजनीति कहलाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो जनता के सामाजिक एवं आर्थिक स्तर (सार्वजनिक जीवन स्तर)को ऊँचा करना राजनीति है । लेकिन यह कहाँ तक समूचे सत्य प्रमाणिक है?

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