बदलते युग में बदलती परंपराएं -विरेन्द्र चंद्रवंशी

बदलते युग में परम्पराओं का बदलना स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी, लेकिन यह पूरी तरह सही या गलत का सवाल नहीं है, बल्कि संतुलन का विषय है।
पहले परम्पराएँ समाज को जोड़ने, अनुशासन बनाए रखने और पहचान देने का काम करती थीं।
आज हम बात करेंगे वैवाहिक परंपराओं में हो रहे बदलाव के बारे में। आधुनिक युग में गाँव की विवाह परम्पराओं में काफ़ी बदलाव देखने को मिल रहे हैं। ये बदलाव सामाजिक, आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक प्रभावों के कारण आए हैं। पहले जहाँ विवाह पूरी तरह परम्परागत और सामूहिक भावना पर आधारित होते थे, वहीं अब उनमें आधुनिकता की झलक साफ़ दिखाई देती है।
सबसे बड़ा बदलाव तकनीक का प्रभाव है। पहले रिश्ते परिवार और समाज के माध्यम से तय होते थे, लेकिन अब मोबाइल, सोशल मीडिया और ऑनलाइन मैट्रिमोनियल साइट्स जैसे शादी डॉट कॉम, जीवनसाथी डॉट कॉम आदि के ज़रिए रिश्ते ढूँढे जा रहे हैं। इससे लोगों की पसंद और दायरा दोनों बढ़ गए हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण बदलाव विवाह के तरीके में आया है। हमारे छत्तीसगढ़ के गांवों में पहले शादियां आमतौर पर 3-5 दिनों तक चलते थे, जिनमें चुलमाटी, तेल चढ़ी, मंगरोहन, मऊर सौपना, हरदाहि, परघौनी, रातिभाजी, भड़ौनी, भाँवर, बिदाई जैसी रस्में प्रमुख हैं, जो परिवार के सदस्यों और समुदाय की भागीदारी के साथ बड़े धूमधाम से निभाई जाती थीं। अब समय की कमी और खर्च के कारण कई रस्में छोटी कर दी गई हैं या खत्म हो रही हैं। “डेस्टिनेशन वेडिंग” और बैंक्वेट हॉल में शादी का चलन गाँवों तक पहुँच गया है।
खर्च और दिखावे में वृद्धि भी एक बड़ा बदलाव है। पहले सादगी से विवाह होते थे, लोग बैलगाड़ी और गुदुम बाजा में बारात जाते थे, लेकिन अब DJ, लाइटिंग, महंगे कपड़े और कैटरिंग पर ज़्यादा खर्च किया जाता है। इससे सामाजिक प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है। पहले की शादी में घर के लोग खाना बनाते थे और नाचने वाले बाहर से बुलाए जाते थे, लेकिन अब इसका उल्टा हो गया है। अब घर के लोग नाचते हैं और खाना बनाने वाले बाहर से बुलाए जाते हैं।
लड़कियों की भूमिका और शिक्षा ने भी परम्पराओं को बदला है। अब लड़कियाँ अधिक शिक्षित और आत्मनिर्भर हो रही हैं, जिससे वे अपने जीवनसाथी के चयन में भागीदारी निभाती हैं। बाल विवाह जैसी कुप्रथाएँ कम हो रही हैं और विवाह की उम्र भी बढ़ी है।
इसके अलावा जाति और समाज की सीमाएँ भी धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं। पहले जहाँ शादी अपने ही समाज या जाति में होती थी, अब अंतरजातीय और प्रेम विवाह भी स्वीकार किए जाने लगे हैं।
अंत में, कहा जा सकता है कि गाँवों की विवाह परम्पराएँ अब परम्परा और आधुनिकता का मिश्रण बन गई हैं। जहाँ एक ओर कुछ पुरानी रस्में अभी भी जीवित हैं, वहीं दूसरी ओर नई सोच और सुविधाओं ने विवाह को अधिक व्यक्तिगत और आधुनिक बना दिया है।
अंत मे बस इतना ही कहना चाहूंगा कि “स्वतंत्र रहिए विचारों से, पर बंधे रहिए संस्कारों से” जय जोहार.
विरेन्द्र चंद्रवंशी


