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विश्व स्तनपान सप्ताह की शुरुआत, पहले घंटे में स्तनपान और छह माह तक केवल मां के दूध पर जोर


स्वास्थ्य संस्थानों में जागरूकता अभियान, माताओं को बताए जा रहे वैज्ञानिक लाभ

रायपुर। नवजात शिशुओं को स्वस्थ और सुरक्षित जीवन की शुरुआत दिलाने के उद्देश्य से प्रदेशभर में विश्व स्तनपान सप्ताह की शुरुआत हो गई है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा सप्ताहभर अस्पतालों, सामुदायिक एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों तथा समुदाय स्तर पर विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। अभियान के तहत माताओं, गर्भवती महिलाओं और उनके परिजनों को स्तनपान के महत्व और इसके वैज्ञानिक लाभों की जानकारी दी जा रही है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, शिशु के जन्म के पहले घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करना और पहले छह माह तक केवल मां का दूध पिलाना उसके स्वस्थ विकास की सबसे मजबूत नींव है। मां का पहला गाढ़ा पीला दूध, जिसे कोलोस्ट्रम कहा जाता है, नवजात के लिए प्राकृतिक सुरक्षा कवच का कार्य करता है। यह संक्रमण से बचाने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और कुपोषण के खतरे को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि छह माह बाद उम्र के अनुरूप ऊपरी आहार शुरू करने के साथ दो वर्ष या उससे अधिक समय तक स्तनपान जारी रखना शिशु के समुचित विकास के लिए लाभदायक है।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, स्तनपान केवल शिशु के लिए ही नहीं, बल्कि मां के स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी है। इससे प्रसव के बाद मां के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार होता है, कई गंभीर बीमारियों का जोखिम कम होता है और मां-बच्चे के बीच भावनात्मक संबंध भी मजबूत होते हैं।

विश्व स्तनपान सप्ताह के दौरान स्वास्थ्य संस्थानों में गर्भवती एवं धात्री माताओं की काउंसलिंग, समूह चर्चा, स्वास्थ्य शिक्षा सत्र, प्रश्नोत्तर कार्यक्रम और व्यवहारिक प्रशिक्षण आयोजित किए जा रहे हैं। चिकित्सक, स्टाफ नर्स, एएनएम, मितानिन, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता तथा अन्य स्वास्थ्यकर्मी माताओं को सही स्तनपान तकनीक, नवजात की देखभाल और स्तनपान से जुड़े सामान्य भ्रमों का वैज्ञानिक समाधान भी बता रहे हैं।

स्वास्थ्य विभाग ने अपील की है कि स्तनपान को केवल मां की जिम्मेदारी न मानकर पूरे परिवार की साझा जिम्मेदारी समझा जाए। परिवार का सहयोग, सकारात्मक वातावरण और सही जानकारी प्रत्येक नवजात को स्वस्थ जीवन की बेहतर शुरुआत देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जनभागीदारी और जागरूकता से मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत बनाते हुए कुपोषण मुक्त एवं स्वस्थ समाज के निर्माण की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं।

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