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मोबाइल युग में खोती जा रही पत्र लेखन और सामाजिक संस्कारों की परंपरा— संतोष ताम्रकार

AP न्यूज़ विश्वराज ताम्रकार


दुर्ग : आज के आधुनिक दौर में मोबाइल फोन ने लोगों के जीवन को आसान तो बनाया है, लेकिन इसके साथ ही कई सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराएं भी धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। एक समय था जब लोग अपने भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने के लिए पत्र लिखा करते थे। कागज और कलम के माध्यम से लिखे गए शब्दों में अपनापन, संवेदनाएं और आत्मीयता झलकती थी।
वर्तमान समय में मोबाइल और सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग ने पत्र लेखन की परंपरा को लगभग समाप्त कर दिया है। कभी लोग दूर रहकर भी एक-दूसरे के दिल के करीब हुआ करते थे, वहीं आज तकनीक की सुविधा के बावजूद रिश्तों में दूरी महसूस होने लगी है। मोबाइल पर संदेशों और इमोजी के माध्यम से संवाद तो हो रहा है, लेकिन भावनाओं की गहराई कहीं न कहीं कम होती दिखाई देती है।
संतोष ताम्रकार ने अपनी रचना के माध्यम से वर्तमान सामाजिक स्थिति पर चिंतन व्यक्त करते हुए कहा है कि आज लिखना-पढ़ना केवल विद्यार्थियों तक सीमित होता जा रहा है। पहले लोग अपने अरमान, भावनाएं और विचार कागज पर उतारते थे, जबकि अब अधिकांश समय मोबाइल स्क्रीन पर ही बीत जाता है।
उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में बताया कि आज एक ही कमरे में बैठे चार लोग आपस में बातचीत करने के बजाय अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। शिष्टाचार और पारिवारिक संस्कारों में भी परिवर्तन देखने को मिल रहा है। पहले बड़ों का सम्मान करने के लिए चरण स्पर्श किया जाता था, जबकि आज यदि कोई व्यक्ति बातचीत के दौरान अपना मोबाइल एक तरफ रख दे, तो उसे ही सबसे बड़ा सम्मान माना जाने लगा है।
यह रचना आधुनिक जीवनशैली के बीच मानवीय संबंधों, संवाद और संस्कारों को बचाए रखने का संदेश देती है तथा लोगों को तकनीक के संतुलित उपयोग के प्रति जागरूक करती

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