पाटेश्वर धाम तीर्थ के संत राम बालक दास जी द्वारा प्रतिदिन ऑनलाइन सत्संग का आयोजन किया जाता है, यह अद्भुत ऑनलाइन सत्संग


@apnews8 सितम्बर बालोद:
प्रकृति की सुंदर छटा के बीच स्थित पाटेश्वर धाम तीर्थ के संत राम बालक दास जी द्वारा प्रतिदिन ऑनलाइन सत्संग का आयोजन किया जाता है, यह अद्भुत ऑनलाइन सत्संग उनके द्वारा उनकी व्हाट्सएप ग्रुप सीता रसोई संचालन ग्रुप में प्रातः 10:00 से 11:00 बजे और दोपहर में 1:00 से 2:00 बजे किया जाता है, जिसमें सभी भक्तगण जुड़कर सत्संग का भरपूर आनंद उठाते हैं, एवं अपनी विभिन्न जिज्ञासाओं को भी संत श्री के ज्ञान द्वारा तृप्त करते हैं
आज की सत्संग परिचर्चा में रिचा बहन घोठिया ने पितृ पक्ष पर जिज्ञासा रखते हुए कहा कि गीता में कहा गया है कि जब भी किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उसका तुरंत ही पुनर्जन्म हो जाता है तो फिर यह पितृ पूजन गया पिंडदान पितृपक्ष क्यों, संत श्री ने इस विषय को स्पष्ट करते हुए कहा कि श्रीमद भगवत गीता में श्री कृष्ण जी ने अर्जुन से कहा कि, जो लोग वर्णसंकर होते हैं
अर्थात योद्धा लोगों की मृत्यु युद्ध में हो जाती है तो उनकी विधवा या दूषित स्त्रियों द्वारा उत्पन्न संतान को वर्णसंकर कहा जाता है उनके द्वारा यदि पितरों का तर्पण किया जाए तो उनके पितर तृप्त नहीं होते और वे भटकते रहते हैं अतः श्री कृष्ण जी ने भी स्पष्ट किया है कि वर्ण शंकर द्वारा दिया गया पितृ तर्पण पितरों को स्वीकार नहीं होता, अतः गोत्रज द्वारा किया गया तर्पण ही पितरों को तृप्त करता है
इस प्रकार श्री कृष्ण जी ने भी स्पष्ट किया है कि पितरों का तर्पण गोत्रज द्वारा किया जाना चाहिए, परंतु क्या हम जानते हैं कि पितर योनि प्राप्त करने वाले कौन होते हैं, भगवान श्री कृष्ण जी ने गीता में कहा है कि जो जीवात्मा पूण्य कार्य करते हुए, सत्कर्म करते हुए, सकाम भावना को त्याग कर, निष्काम कर्म करते हुए कर्मो के फल की चिंता ना करते हुए अपने कर्मों को करता है क्योंकि जो कर्म हमने कीये है उसका क्या परिणाम होगा वह तो हमारे वश में नहीं है तो हमेशा ही सत्कर्म करते जाएं क्योंकि अच्छे कर्मों का फल भी अच्छा ही होते हैं भले ही वह हमें देर से ही क्यों ना प्राप्त,हो ऐसे व्यक्ति मृत्यु के पश्चात अच्छे संस्कार युक्त परिवार में जन्म लेते हैं, और वे पितरयोनि को प्राप्त नहीं होते, और जो व्यक्ति हमेशा दूसरों का बुरा करते हैं, मन में कल्याण की भावनाएं नहीं होती, बुरे कर्म को ही प्राथमिकता देते हैं, जीते जी भी उन्हें पशु के रूप में ही अपना जीवन जीते हैं शराब पीना मदिरापान करना मांसाहार करना उनका जीवन होता है, वे मृत्यु पश्चात नर्क को भोगते हैं और वे भी पितर नहीं बनते
पितर वे होते हैं जिनके लिए हमारे मन में सम्मान होता हैं अपने पितरों को 15 दिन याद करना, उनके लिए तिलांजलि, तर्पण श्राद्ध आदि द्वारा उन्हें सम्मान देना, हो सके या ना हो सके लेकिन 15 दिन उनके लिए एक दीपक अवश्य लगाएं, जब माता-पिता का दिन भाई-बहन का दिन दोस्त का दिन हो सकता है तो हम 15 दिन अपने उन पूर्वजों के लिए क्यों नहीं दे सकते जिन्होंने हमारे लिए अपने जीवन का समर्पण किया है, कई बार में हमारे लिए झुके होंगे, जिनके कारण हमारा जीवन है, उनके द्वारा हमारे संस्कार सभ्यता है उनके द्वारा ही हमारी संपत्ति है, तो क्या हम उनके सम्मान में अपने जीवन के 15 दिन नहीं दे सकते, इसके लिए कोई तर्क वितर्क, शंका कुशंका कभी नहीं करनी चाहिए, बस 15 दिन उनका सम्मान कीजिए, इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने पितरों हेतु पितृ पक्ष प्रारंभ किया
दूसरी बात यह है कि कोई अगर कहता है कि आपने गया जिसे मैं तर्पण कर दिया या किसी अन्य तीर्थ में उनका तर्पण कर दिया है तो उन्हें आपको याद करने की आवश्यकता नहीं तो यह बिल्कुल नहीं आप भले ही उनका श्राद्ध करे ना करे तिलांजलि तर्पण करें ना करें परंतु उनके नाम से एक दिया अवश्य चलाएं
स्वेच्छा बहन पथरी ने प्रश्न किया कि, वर्तमान में पृथ्वी में 200 से अधिक देश है जब भगवान का अवतार हुआ उस समय भी वे देश रहे होंगे या पूरे भारत का ही भाग था क्योंकि अभी देवी देवता और भगवान भारत में ही है तो बाकी पृथ्वी का हिस्सा उस समय क्या था, इस विषय में बाबा जी ने कहा कि जब ईश्वर थे तो ना हम थे ना विज्ञान था ना ही भूगोल था तो उस समय यहां पृथ्वी कैसे और क्या थी इसका अनुमान लगाना असंभव है लेकिन वेद शास्त्र में वर्णन मिलता है कि संपूर्ण विश्व जम्बु दीप कहा जाता था जो एक भाव भारत के रूप में ही था उस समय पूरे विश्व मैं एक ही देश की प्रभुता चलती थी ऐसा 5 करोड़ वर्ष पूर्व लिखे गए वेद पुराण में वर्णित है, विश्व में 200 देश अभी है लगभग 100 देश की उत्पत्ति ईसा सन में ही हुई है 2000 साल पहले यहां इतने देश नहीं थी 5000 साल पूर्व महाभारत काल में वर्णित है कि लगभग 70 देशों पर भारत का शासन था और सभी भारत को कर देते थे और भारत सब की रक्षा करता था तो यही मान सकत