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ईदुल अज़हा पर पवित्र कुर्बानी से देश के व्यापार व्यवसाय को होता है लाभ – सैय्यद अफज़ल अली

राजनांदगांव जिला कांग्रेस कमेटी व्यापार प्रकोष्ठ के अध्यक्ष एवं उत्तर ब्लॉक संगठन के शहर महामंत्री सैय्यद अफज़ल अली ने कहा कि देश का किसान व्यवसाय धर्म पर आधारित नही बल्कि विभिन्न समाज के सभी किसानों व्यपारी इस व्यापार से लाभान्वित होते है,कोई चीनी उत्पाद नहीं कोई एमएनसी उत्पाद नहीं 100% स्वदेशी ग्रामीण अर्थशास्त्र यह मानते हुए कि 20 करोड़ भारतीय मुसलमान ईद उल अज़हा मनाते है,अनुमान है कि 10-10 प्रतिशत मुसलमान कम से कम 2,00,00,000/- (2 करोड़)।बकरियों/भेड़ों की कुर्बानिया देंगे।2 करोड़ × 20,000 / रुपये, भेड़/बकरे = 40,000 करोड़।सभी को आर्थिक लाभ होता है।यदि एक बकरी पालन किसान साल में लगभग 10 बकरियों का प्रबंधन करता है। 2 करोड़ 10 = 20 लाख परिवार को “रोज़गार” मिलता है। इस ईद का स्थानीय व्यवसायों में 40,000 करोड़ रुपये का योगदान है और लगभग 20 लाख छोटे किसानों को रोज़गार प्रदान करता है। ये व्यापार सभी धर्म के व्यापारी करते है जिससे व्यापार व्यवसाय को गति मिलती है, साथ ही जो नानवेज है वो प्रत्येक बकरे का गोश्त ग़रीबों में बांट कर कम से कम 20 लोग खाते हैं, इसलिए ये ईद 2 करोड़ 20 लोगों के हिसा से, 40 करोड़ लोगों को मुफ्त भोजन प्रदान करती है। यह एक न्यूनतम अनुमान है, वास्तविक इससे दोगुना हो सकता है। ग्रामीण भारत में पशुधन सबसे अधिक तरल संपत्ति है और रोज़गार बढ़ाने के लिए भारत सरकार के माध्यम से इसके व्यापार को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। ये जीडीपी और रोज़गार में योगदान देने वाले भारत के सबसे बड़े क्षेत्रों में से एक। जो लोग कहते हैं कि मुसलमानों को इस त्योहार को जानवरों की कुर्बानी करके नहीं मनाना चाहिए कृपया अन्य व्यवसाय और रोज़गार पहलुओं को भी देखें। श्री अली ने आगे कहा कि जैसे ही ये ईद नज़दीक आती है बकरों की संख्या बढ़ जाती, उनका शोर बढ़ जाता है और साथ में उन लिबरल्स का शोर सुनाई देता है जो साल भर मटन चिकन बड़े शौक़ से खाते हैं। अब बात करते है क्यो मनाते है ईदुल अज़हा”हज़रत इब्राहिम अलैहिसलाम को एक औलाद की चाह थीं औऱ रब ने उनकी “दुआ क़ुबूल की और घर में एक नन्हा पैग़म्बर ( इस्माइल अ. स. )ने दस्तक दिया मानो हर ख़ुशियाँ उन्हें मिल गई हो अपने रब से जो बरसो से आरज़ू अधूरी थी वह पूरी हो गई । ऐसा लगता दोनों माँ-बाप की ज़िन्दगी व जवानी गुलज़ार हो गई हो फिर से और हो भी क्यों न इतने मीन्नतों के बाद जो हुए थें नन्हें इस्माइल बड़े अच्छे से दिन गुज़र रहे थे यहाँ तक की इस्माइल 6-7 वर्ष के हो गयें, तो एक रात उनके वालिद हजऱत इब्राहिम ने एक ख़्वाब देखा जो उनके रब के तरफ़ से था के इस्माइल को क़ुर्बान करो अगर तुम अपने रब के फ़रमाँबरदार हो सुबह होते ही अपनी बीवी हाजरा को कहा इस्माइल को नये कपड़े पहना कर तैयार करिये उन्हें शैर पर ले जाना है और बाप बेटे दोनों घर से जंगलों के तरफ़ निकल पड़ें, इस्माइल बाप की ऊँगली पकड़ कर तोतली ज़ुबान में हँसते बतियाते उछलते कूदते जा रहे थे और बाप “इब्राहीम” आँख में आँसू लिए सिर्फ़ उनका मुँह ताके जा रहे थे। जैसे ही दोनों जंगल में पहुँचे तो इब्राहिम ने कहा ए इस्माइल तू जानता है अल्लाह मुझसे भी अच्छा है और जन्नत दुनिया से भी बेहतर जगह है और अल्लाह ने तुझे अपने पास जन्नत में बुलाया है, तेरा रब चाहता है के मैं तुझे क़ुर्बान कर दूँ, ए इस्माइल ! तेरी क्या राय है ? झट से इस्माइल ने कहा अब्बा यानी अल्लाह तुमसे भी अच्छा और जन्नत दुनिया से भी बेहतर तो फिर देर किस बात की है जल्दी से मुझे क़ुर्बान करो, अरे हाँ ! अगर अम्माँ पूछेगी और रोएगी तो क्या होगा ? अच्छा ऐसा करो के यह मेरा कुर्ता अम्माँ को दे देना और कहना जब भी मेरी याद आये मेरे कुर्ते को देख लिया करे और तुम मुझे अपने कुर्ते में कफ़न करके यहीं दफ़न कर देना क्योंकि मक्का ले जाओगे तो मेरी अम्माँ और दोस्तों को बहुत दुःख होगा और वह रो पड़ेंगे । यह सब सुनते ही इब्राहिम फूट फूट कर रो पड़ें तो नन्हें इस्माइल ने बुलंद आवाज़ में कहा अब्बा ” इन्नल लाह माँअस साबेरीन( बेशक अल्लाह को सब्र करने वाले पसंद हैं ) और तुम भी मुझे सब्र करने वालों में ही पाओगे और कहा के ” अब्बा मुझे उलटा लेटा कर क़ुर्बानी देना कहीं ऐसा न हो के तेरी नज़र मेरे चेहरे पर पड़े और तू पलट जाए फिर क्या यही हिम्मत तो चाहिए था हजऱत इब्राहिम को और अपने कलेजे के टुकड़े का हाथ पाँव बाँधा और कमर को अपने घुटने पर रखा और सर के बाल खिंचे और नीचे के तरफ़ से छुरी रखा गर्दन पर चलाने के लिए पर हाथ काँपने लगा इब्राहिम थम गयें और आसमान के तरफ़ देख कर अपने रब से कहा ए मेरे रब ! तू मुझसे क्यों नाराज़ है ? क्या इस्माइल की मोहब्बत मेरे दिल में तुझसे ज़्यादा जगह पैदा कर दी तो तू समझ बैठा के इस्माइल तुझसे ज़्यादा अज़ीज़ है मेरे लिये ? न न तुझपे दस इस्माइल क़ुर्बान ” यह कहते ही हजऱत इस्माइल के गर्दन पर छुरी चलाई के तुरन्त इस्माइल के जगह न जाने कहाँ से दूंबा( Fat-Tailed Sheep ) आगया और ग़ैब (आकाशवाणी) से आवाज़ आयी के ए इब्राहिम तुझे तेरे रब ने सच्चा और सब्र करने वाला पाया तो तेरे इस्माइल की क़ुर्बानी क़ुबूल की और तेरे इस्माइल को फिर से लौटाया बस दोस्तो यही तो था एक बाप हजऱत इब्राहिम के सब्र और नन्हें इस्माइल की क़ुर्बानी का वाक्या जो आज दुम्बा बकरों के रूप में दिया जाता है ईदुल अज़हा का मतलब कुर्बानी की ख़ुशी का दिन ये कुर्बानी सिर्फ़ जानवर की कुर्बानी नहीं बल्कि अपनी हर उस ख्वाहिश और हर उस अमल की कुर्बानी है जिससे अल्लाह नाराज होते हैं, ईद उल अजहा पर अपने पड़ोसियों का ख्याल रखा जाता है अपने गरीब पड़ोसी के घर कुर्बानी का हिस्सा दिया जाता है इस्लाम यह सिखाता है कि अच्छे अखलाक से अपनी खुशियों में सबको शरीक किया जाए ,और सबसे मोहब्बत किया जाए लिहाजा हम सच्चे मुसलमान होने के नाते अपनी बिरादराने वतन को ईद की खुशी में शरीक करते हैं, सभी भाइयों से गुजारिश है कि की ईद की मुबारकबाद खासकर ड्यूटी पर तैनात इन्तेजामिया के अहलकार और पुलिस वालों से गले मिलकर उनका शुक्रिया अदा किया जाए। सभी देश वासियों से गुजारिश है ईदुल अजहा पर.. ये जो महामारी फैली हुई है उसको मद्देनजर रखते हुए social Distancing का पूरा खयाल रखे किसी के भी घर जाए तो मुंह में मास्क और सैनिटाइजर का प्रयोग करे।

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