साइक्लोस्टाइल मशीन से अंग्रेजों के खिलाफ बुलेटिन की प्रतियां बनाईं, सेनानी समारूराम महोबिया को हुई थी 3 साल की सजा
कवर्धा। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संस्था कबीरधाम जिला की ओर से सितंबर माह के प्रथम रविवार को भारतमाता चौक में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. समारूराम महोबिया को श्रद्धांजलि दी गई।

कार्यक्रम राष्ट्रीय महासचिव श्री जितेंद्र रघुवंशी, कनखल हरिद्वार के निर्देशन में हुआ। भारतमाता की प्रतिमा और स्व. महोबिया के तेलचित्र पर गुलाल का तिलक लगाकर पुष्प अर्पित किए गए। इसके बाद दीप प्रज्वलन और आरती की गई। भारतमाता की जय, महात्मा गांधी की जय, वंदे मातरम् और सुभाषचंद्र बोस एवं समारूराम महोबिया अमर रहें के नारों से वातावरण गूंज उठा।
संस्था के अध्यक्ष डॉ. नरेश कुमार यदु ने बताया कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की स्मृति में जिले में लगातार श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। यह दसवां कार्यक्रम था। इसकी शुरुआत दिसंबर 2025 में बिलासपुर में आयोजित सेनानी उत्तराधिकारी राज्य स्तरीय सम्मेलन से मिली प्रेरणा के बाद की गई थी।
छुईखदान से रायपुर ले गए थे साइक्लोस्टाइल मशीन
कार्यक्रम में संस्था के कोषाध्यक्ष महेश महोबिया ने अपने पिता एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. समारूराम महोबिया के स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि समारूराम महोबिया का जन्म 7 नवंबर 1909 को छुईखदान में हुआ था। वे अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय रहे और तत्कालीन प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ठाकुर प्यारेलाल के संपर्क में भी रहे।
8 अगस्त 1942 को बंबई कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए विस्तृत जानकारी वाला बुलेटिन जारी किया गया था। छुईखदान कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष गोवर्धन वर्मा बंबई से रायपुर पहुंचे और अंग्रेजों से बचते हुए ठाकुर प्यारेलाल के घर ठहरे थे। इसी दौरान समारूराम महोबिया को छुईखदान से साइक्लोस्टाइल मशीन रायपुर लाने की जिम्मेदारी दी गई।
महोबिया मशीन लेकर रायपुर पहुंचे और बंबई कांग्रेस अधिवेशन के बुलेटिन की सैकड़ों प्रतियां तैयार कीं। इसके बाद वे प्रतियां लेकर छुईखदान लौटे और आम पब्लिक स्कूल सहित विभिन्न स्थानों के भवनों पर बुलेटिन चस्पा कर लोगों तक आंदोलन का संदेश पहुंचाया।
अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया, कोर्ट ने सुनाई 3 साल की सजा
अंग्रेजी शासन को इसकी जानकारी होने के बाद समारूराम महोबिया को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। अदालत ने 11 अक्टूबर 1942 को भारतीय दंड विधान की धारा 17(2) और 38(5) डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स के तहत उन्हें तीन वर्ष की सजा सुनाई। उनके साथ अमृतलाल महोबिया और पूनमचंद सांकला को भी तीन-तीन वर्ष की सजा हुई थी।
स्व. महोबिया ने अंग्रेजों के खिलाफ जंगल सत्याग्रह आंदोलन में भी सक्रिय रूप से भाग लिया था। आंदोलन के कारण उन्हें छह माह जेल में रहना पड़ा। स्वतंत्रता दिवस की रजत जयंती के अवसर पर वर्ष 1973 में राज्य शासन की ओर से उन्हें ताम्रपत्र भेंट कर सम्मानित किया गया था।
‘कुर्बानियों से मिली आजादी, नई पीढ़ी को इतिहास जानना जरूरी’
डॉ. नरेश कुमार यदु ने कहा कि देश की आजादी हजारों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की कुर्बानियों का परिणाम है। आजादी के आंदोलन में शामिल सेनानियों के संघर्ष और बलिदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समाज की जिम्मेदारी है। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।
संस्था ने अगले माह श्रद्धांजलि कार्यक्रम कबीरधाम जिले के ग्राम झिरोनी में आयोजित करने का निर्णय लिया है। कार्यक्रम में डॉ. नरेश कुमार यदु, इंजी. एसएस जैन, नरोत्तम महोबिया, महेश महोबिया, सियाराम महोबिया, गुरुप्रसाद शर्मा सहित संस्था के पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित रहे।


