विश्व खाद्य दिवस विशेष: खेत से बाजार नहीं, मूल्य संवर्धन तक पहुंचे कृषि

रिकॉर्ड उत्पादन के बाद अब पोषण सुरक्षा, जलवायु अनुकूल खेती और किसानों की शुद्ध आय बढ़ाना जरूरी : डॉ. एम.एल. जाट
रायपुर। भारत ने खाद्यान्न की कमी से निकलकर रिकॉर्ड उत्पादन तक का सफर तय किया है। अब कृषि क्षेत्र के सामने अगली चुनौती केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि किसानों की आय में वृद्धि, खाद्य पदार्थों का मूल्य संवर्धन और प्रत्येक नागरिक तक पौष्टिक भोजन पहुंचाना है। इसके लिए जलवायु अनुकूल खेती, आधुनिक तकनीक, कृषि प्रसंस्करण और पारंपरिक ज्ञान के समन्वय पर जोर देना होगा।
विश्व खाद्य दिवस के अवसर पर कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने अपने लेख में कृषि क्षेत्र की बदलती प्राथमिकताओं को रेखांकित किया है। उन्होंने कहा कि कृषि की सफलता का आकलन केवल पैदावार से नहीं, बल्कि किसानों की शुद्ध आय, संसाधनों के संरक्षण और लोगों को मिलने वाले पोषण के आधार पर भी होना चाहिए।
खाद्यान्न आत्मनिर्भरता से पोषण सुरक्षा तक का सफर
भारत की कृषि यात्रा में हरित क्रांति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्नत बीजों, सिंचाई, कृषि अनुसंधान, उर्वरकों और संस्थागत सहायता से देश ने खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल की। अब कृषि को अनाज उत्पादन तक सीमित रखने के बजाय पोषण, रोजगार, उद्यमिता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के माध्यम के रूप में विकसित करने की जरूरत है।
लेख के अनुसार, वर्ष 2024-25 में देश का खाद्यान्न उत्पादन 357.73 मिलियन टन रहा, जबकि वर्ष 2025-26 के लिए 376.56 मिलियन टन उत्पादन का अनुमान व्यक्त किया गया है। यह उपलब्धि कृषि क्षेत्र की क्षमता को दर्शाती है, लेकिन आगे की रणनीति में कम संसाधनों के उपयोग से बेहतर उत्पादन और किसानों को उपज का उचित मूल्य दिलाने पर ध्यान देना होगा।
जलवायु अनुकूल खेती में विज्ञान की भूमिका अहम
जलवायु परिवर्तन, भूजल का गिरता स्तर और मिट्टी की गुणवत्ता में कमी कृषि के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। ऐसे में सूखा, अत्यधिक गर्मी और बाढ़ जैसी परिस्थितियों को सहन करने वाली फसल किस्मों का विकास जरूरी है। जीनोमिक्स, जीन एडिटिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रिमोट सेंसिंग और डिजिटल कृषि जैसी तकनीकें खेती को अधिक सक्षम बनाने में मदद कर सकती हैं।
डॉ. जाट के अनुसार, कृषि अनुसंधान का लक्ष्य अब उत्पादन बढ़ाने के साथ फसलों की पोषण गुणवत्ता और जलवायु अनुकूलता में सुधार करना भी है। प्रति बूंद अधिक फसल, प्रति हेक्टेयर अधिक पोषण और प्रति किसान अधिक आय को कृषि विकास का प्रमुख आधार बनाना होगा।
खेत से बाजार नहीं, मूल्य संवर्धन तक पहुंचे किसान
किसानों की समृद्धि के लिए केवल अच्छी पैदावार पर्याप्त नहीं है। ग्रेडिंग, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, भंडारण, कोल्ड चेन और निर्यात जैसी गतिविधियों से कृषि उपज का मूल्य बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), सहकारी समितियों और डिजिटल बाजारों को मजबूत करने की आवश्यकता है।
देश में लगभग 86 प्रतिशत कृषि जोत छोटी और सीमांत श्रेणी की हैं। ऐसे में सामूहिक प्रयासों के माध्यम से किसानों को बेहतर बाजार, खरीदारों और वित्तीय सुविधाओं से जोड़ना महत्वपूर्ण है। ई-नाम और एग्री स्टैक जैसे डिजिटल माध्यम इस दिशा में मददगार हो सकते हैं।
खाद्य सुरक्षा के साथ पोषण पर भी ध्यान
देश में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ने के बाद अब दालों, तिलहनों, फलों, सब्जियों, दूध, अंडों और मछली जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बढ़ाना जरूरी है। लेख में खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता कम करने और घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता भी बताई गई है।
कटाई के बाद कृषि उपज का नुकसान भी एक बड़ी चुनौती है। लेख में आईसीएआर-सीफेट के अनुमानों का हवाला देते हुए बताया गया है कि फलों और सब्जियों में कटाई के बाद 4.5 से 15 प्रतिशत तथा अनाज और दालों में 3 से 6 प्रतिशत तक नुकसान होता है। भंडारण सुविधाओं, छोटे गोदामों और कोल्ड चेन का विस्तार कर इस नुकसान को कम किया जा सकता है।
इसके साथ ही सूक्ष्म सिंचाई, जल संरक्षण और कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली फसलों को बढ़ावा देना आवश्यक है। जिंक और आयरन जैसे पोषक तत्वों से समृद्ध जैव-संवर्धित फसलें भी कुपोषण और छिपी भूख की समस्या से निपटने में सहायक हो सकती हैं।
आधुनिक तकनीक और पारंपरिक ज्ञान का समन्वय जरूरी
भारतीय कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान और पारंपरिक कृषि ज्ञान का प्रमाण-आधारित समन्वय जरूरी है। पारंपरिक जल प्रबंधन और खेती की पद्धतियों का वैज्ञानिक मूल्यांकन करते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेंसर और रिमोट सेंसिंग जैसी तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है।
इस बदलाव में महिला किसानों, ग्रामीण युवाओं और कृषि स्टार्टअप की भागीदारी भी महत्वपूर्ण होगी। कृषि अनुसंधान का लाभ तभी व्यापक होगा, जब नई तकनीक प्रयोगशालाओं से निकलकर खेतों तक पहुंचे और किसानों की वास्तविक समस्याओं का समाधान करे।
किसानों की समृद्धि ही सफलता का असली पैमाना
डॉ. जाट के अनुसार, भारत की कृषि व्यवस्था को मात्रा आधारित उत्पादन से मूल्य आधारित समृद्धि की ओर बढ़ना होगा। इसके लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, किसानों की भागीदारी, बाजार सुविधाओं और प्रभावी नीतियों के बीच समन्वय आवश्यक है।
विश्व खाद्य दिवस का संदेश भी इसी बदलाव की ओर संकेत करता है—उत्पादन से पोषण तक, खेत से मूल्य संवर्धन तक और कृषि विकास से किसानों की स्थायी समृद्धि तक। जब किसानों की शुद्ध आय बढ़ेगी, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होगा और लोगों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध होगा, तभी कृषि विकास को वास्तविक सफलता माना जा सकेगा।
लेखक परिचयः डॉ. एम.एल. जाट, सचिव, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) तथा महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)।



