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बोड़ला में बलराम सदन पर लटका है वीआईपी ताला : महीनों बाद भी नहीं हो पाया लोकार्पण, 42° की आग में जमीन पर बैठने को मजबूर किसान

कवर्धा। कबीरधाम जिले के बोड़ला तहसील में किसानों के सम्मान और सुविधा के नाम पर बना ‘बलराम सदन’ आज खुद अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। किसानों की सहूलियत के लिए लाखों की लागत से तैयार ‘बलराम सदन’ बोड़ला में प्रशासनिक संवेदनहीनता और वीआईपी संस्कृति का स्मारक बनकर रह गया है। विडंबना देखिए कि एक तरफ पारा 42 डिग्री के पार जा चुका है, आसमान से आग बरस रही है, वहीं दूसरी ओर किसानों के लिए बना यह सदन केवल इसलिए बंद है क्योंकि अब तक किसी ‘वीआईपी’ या ‘बड़े नेता’ के पास इसका फीता काटने का समय नहीं है।

कड़कड़ाती धूप और किसानों का दर्द

सोमवार को तहसील कार्यालय पहुंचे किसानों का सब्र उस वक्त टूट गया जब 42 डिग्री की झुलसाने वाली गर्मी में उन्हें सिर छिपाने के लिए एक पेड़ की छांव तक नसीब नहीं हुई। वनांचल क्षेत्रों से 30 किलोमीटर का सफर तय कर आए किसानों ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा— “हम इस लू में अपना काम कराने आते हैं, लेकिन यहां बैठने की कोई व्यवस्था नहीं है। सामने आलीशान बलराम सदन खड़ा है, मगर उस पर ताला लटका है। क्या प्रशासन को हमारे पसीने की कोई कीमत नहीं दिखती?”

क्या अन्नदाता से बड़े हैं राजनेता?

किसानों का आक्रोश अब फूटने लगा है। उनका सीधा सवाल है— “क्या हमारे पसीने और तपस्या की कोई कीमत नहीं है? क्या जब तक कोई बड़ा नेता नहीं आएगा, तब तक हम इसी तरह लू के थपेड़े खाते रहेंगे?” अधिकारियों की चुप्पी यह संकेत दे रही है कि उन्हें एसी कमरों से बाहर बैठे किसानों के झुलसते चेहरों का अहसास तक नहीं है।

लोकार्पण से पहले ही भ्रष्टाचार की ‘दरारें’

हैरानी की बात यह है कि जिस भवन का अभी विधिवत उद्घाटन भी नहीं हुआ है, उसकी दीवारों पर अभी से दरारें नजर आने लगी हैं। यह निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

क्या वीआईपी की चमक के आगे फीका है किसानों का पसीना?

सवाल यह उठता है कि आखिर यह दरवाजा किसके लिए बंद है। क्या प्रशासन किसी ‘बड़े नेता’ या ‘वीवीआईपी’ के फीता काटने का इंतजार कर रहा है ? स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है कि जब भवन जनता के पैसे से बना है, तो किसी नेता के इंतजार में किसानों को धूप में तपने के लिए क्यों छोड़ दिया गया है? कवर्धा में सर्वसुविधा युक्त सदन शुरू हो चुका है, तो बोड़ला के किसानों के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों किया जा रहा है?
लोकार्पण की तारीख बड़ी या किसान की जान? भीषण गर्मी में लू लगने से यदि किसी किसान की तबीयत बिगड़ती है, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? एसी में बैठे साहबों को धूप क्यों नहीं दिखती? जब अधिकारी खुद ठंडी हवा में बैठते हैं, तो किसानों के लिए बना सदन बंद क्यों है?यह केवल एक भवन की बात नहीं है, यह अन्नदाता के आत्मसम्मान की बात है। यदि तत्काल इस सदन के द्वार किसानों के लिए नहीं खोले गए, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि प्रशासन को किसानों की सेवा से ज्यादा ‘वीआईपी संस्कृति’ की चाकरी में दिलचस्पी है।

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