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मांदर की थाप और करमा नाच से बैगा आदिवासी चुनते हैं अपना जीवन साथी

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मांदर की थाप और करमा नाच से बैगा आदिवासी चुनते हैं अपना जीवन साथी, बैगा जनजाति के युवक-युवतियों करमा नाच की प्राचीन परंपरा का आज भी कर रहे  निर्वहन

बोड़ला (आशु चंद्रवंशी)। कबीरधाम जिले के बोड़ला विकासखंड के सुदूर वनांचल वनग्राम बेंदा में बैगा जनजाति के युवक-युवतियों द्वारा करमा नाच की प्राचीन परंपरा का निर्वहन आज भी किया जा रहा है।

सतपुड़ा के मैकल श्रेणी में स्थित बैगा बाहुल्य ग्राम दलदली, केसमरदा, तरेगांव, आमनारा, बोक्करखार ,शंभू पीपर, आमा पानी, सरोधा दादर, चिल्फी, झलमला, बेंदा,बहनाखोदरा ,शीतलपानी, व अनेक सैकड़ों गांव में निवासरत बैगा जनजाति के द्वारा माघ माह के आखिरी तक पारंपरिक रीति रिवाज का पालन करते हुए करमा नाच किया जाता है। इस विषय में वनग्राम बेंदा के आदिवासी भाई ने बताया कि दशहरा के दिन से करमा नाच की शुरुआत होती है और इसे माघ माह के आखिरी तक किया जाता है।

पारंपरिक रीति रिवाज को निभाते आ रहे हैं बैगा जनजाति के लोग

पारंपरिक रीति रिवाज के अनुसार बैगा जनजाति के द्वारा विजयादशमी के दिन से ग्राम देवी ठाकुरदेव या स्थानीय भाषा में खेरमाई को फूल भेंट कर उनके आंगन में पांच करमा गीत गाया जाता है। उसके बाद ग्राम पटेल को मां शीतला मंदिर से लाइव फूल को भेंट कर उनके आंगन में करमा नाच किया जाता है। उसके बाद से फिर यह परंपरा चालू हो जाता है।इसमें प्रत्येक गांव से लड़का या लड़की की टोली अलग-अलग गांव में रात में प्रवेश करते हैं।

पारंपरिक श्रृंगार में करते हैं नृत्य

गांव के छड़ीदार (सामाज के पदाधिकारी) दूसरे गांव के लड़का या लड़की को जगाते हैं और ग्राम पटेल के आंगन में रात भर कर्मा नाचते है। रातभर नाचने के बाद सुबह 8 बजे के बाद वह दल गांव के नदी किनारे अपने साथ लाये सुखा राशन भोजन पकाते हैं और फिर भोजन करने के बाद 2 से 3 बजे के बाद पारंपरिक श्रंगार में सज-धजकर ग्राम पटेल के आंगन में या गांव के मुखियाओं के आंगन में रात 3 से 9 बजे तक करमा नाच करते हैं। इस दौरान शाम को खाने की व्यवस्था ग्रामवासियों के द्वारा की जाती है।

यह भी है मान्यता

गांव के युवा बृजलाल मेरावी ने करमा नाच के मान्यता के विषय में जानकारी देते हुए बताया कि बैगा जनजाति की ऐसी मान्यता है कि विजयादशमी के दिन बजाए गए पहले ढोल से जंगल में स्थित जड़ी बूटी संजीवनी में परिवर्तित हो जाती है। स्थानीय भाषा में इसे जाग जाता है कहते हैं या कहें की जंगली जड़ी बूटियों की मारक क्षमता बढ़ जाती है। दशहरा के ढोल के बाद जड़ी-बूटी में शक्तिआ जाने की मान्यता है जिसे लेकर करमा नृत्य किया जाता है। इसके अलावा सामाजिक संस्कृति को बचाए जाने के लिए भी करमा नृत्य किए जाने की परंपरा बनी हुई है।

एक-दूसरे को पसंद भी करते हैं युवक-युवतियां

करमा नाच के दौरान ही बैगा जनजाति के लड़का-लड़की एक दूसरे को पसंद कर सकते हैं। इसके अलावा बैगा जनजाति समाज के एक परिवार से दूसरे परिवार के साथ जुड़ाव भी हो जाता है। इस तरह इसका सामाजिक व पारंपरिक महत्व है। इस तरह प्रत्येक साल बैगा जनजाति के युवक व युवतियों के द्वारा पुरानी संस्कृति व परंपरा को बचाने के लिए मांदर वाद्य यंत्र के साथ घास के वीरन, मोर पंख, छीट के कपड़ा जिसे दुपट्टा कहा जाता है, इन पारंपरिक परिधानों व वाद्यों के साथ करमा नाचा जाता है।

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