चार वर्ष के लंबे अंतराल के बाद इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में संपन्न हुआ 17वें दीक्षांत समारोह का आयोजन

AP न्यूज विश्वराज ताम्रकार जिला ब्यूरो चीफ केसीजी
राज्यपाल एवं कुलाधिपति की अध्यक्षता में हुआ कार्यक्रम
05 को डी.लिट्, 64 को शोध उपाधि तथा 236 विद्यार्थियों को मिला पदक
खैरागढ़ : इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में चार वर्ष के लंबे अंतराल के बाद माननीय कुलपति महोदया प्रो.(डॉ.) लवली शर्मा के संरक्षण एवं निर्देशन में 28 जनवरी 2026 को दीक्षांत समारोह का आयोजन गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। दीक्षांत समारोह की अध्यक्षता राज्यपाल एवं कुलाधिपति महोदय रमेन डेका ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में उच्च शिक्षा मंत्री टंकराम वर्मा व वि.वि. के कार्यकारिणी सदस्य व धरसींवा विधायक डॉ. अनुज शर्मा उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरूआत राष्ट्रगान एवं मां सरस्वती की प्रतिमा व राजकुमारी इंदिरा के तैलचित्र पर पुष्प अर्पण व दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। इसके बाद कुलगीत की प्रस्तुति दी है। कुलपति ने उपाधि प्राप्तकर्ताओं को अनुशासन दिया जिसके बाद कुल 05 शोधार्थियों को डी.लीट की उपाधि प्रदान की गई वहीं 64 शोधार्थियों को शोध उपाधि प्रदान की गई। इसी तरह कुल 236 विद्यार्थियों को पदक वितरण किया गया जिसमें 232 विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक एवं 04 विद्यार्थियों को रजत पदक दिया गया।
राजकुमारी इन्दिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय के नाम से जाना जायेगा खैरागढ़ का विश्वविद्यालय – राज्यपाल एवं कुलाधिपति
दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुये राज्यपाल एवं कुलाधिपति ने कहा कि खैरागढ़ का यह संगीत विश्वविद्यालय राजकुमारी इन्दिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय के नाम से जाना जायेगा। इसके लिये उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से सभी प्रक्रियाएं पूर्ण करने की बात कही। उन्होंने आगे कहा कि विश्वविद्यालय को ज्ञान का मशाल कहा जाता है और दीक्षान्त समारोह उसकी गरिमा को बढ़ाता है। भारतीय संस्कृति की बहुमूल्य धरोहर ललित कलाओं के विकास में इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ का अविस्मरणीय योगदान है। लघु भारत का स्वरूप इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय दानवीर राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह एवं रानी पद्मावती देवी के दान का प्रतिफल है। अपनी राजकुमारी इन्दिरा की स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए अपने महल को दान देकर उन पुण्यात्माओं ने छत्तीसगढ़ का मान बढ़ाया। कला राष्ट्र के जीवन का एक मुख्य अंग है। संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापत्य और साहित्य का सम्बन्ध प्रत्यक्ष रूप से जीवन और समाज से रहा है। आज के भौतिकवादी युग में मनुष्य यंत्रवत और संवेदनहीनता की ओर बढ़ रहा है, इसे हमें रोकना है। ललित कलाओं के माध्यम से हम मानव जीवन में सरसता ला सकते हैं। कुलाधिपति ने विश्वविद्यालय के सत्रहवें दीक्षान्त समारोह में पदक प्राप्तकर्ताओं एवं उपाधि धारकों को उनके स्वर्णिम भविष्य की कामना करते हुये उन्हें बधाई व शुभकामनाएं दी।
गुरू-शिष्य परम्परा का निर्वाह कर रहा इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय- उच्च शिक्षा मंत्री
कार्यक्रम को संबोधित करते हुये उच्च शिक्षा मंत्री टंकराम वर्मा ने कहा कि किसी भी देश अथवा समाज को सभ्य और सुसंस्कृत बनाने के लिए शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। शिक्षा से ही समाज, कलाओं और व्यवसाय में उन्नति कर पाता है। भावी पीढ़ी को जैसा बनाना हो वैसा ढालने के लिए शिक्षा पद्धति ही एक साँचे का काम करती है। माता कौशल्या की जन्मभूमि, शबरी की तपोभूमि, आध्यात्मिक ऊर्जा से आलोकित हमारा छत्तीसगढ़ धन-धान्य से परिपूर्ण है। हमारे लिए यह गौरव का विषय है कि विदेशों में इस विश्वविद्यालय के द्वारा भारतीय संस्कृति का प्रसार हो रहा है। प्राचीन काल में शिक्षा गुरूकुल में हुआ करती थी, उसी परम्परा का निर्वाह समोन्नत रूप में इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय कर रहा है। इसके संस्थापक राजा वीरेन्द्र बहादुर एवं रानी पद्मावती देवी को मैं प्रणाम करता हूँ। उनके दान स्वरूप उनकी पुत्री राजकुमारी इन्दिरा की स्मृति में स्थापित यह विश्वविद्यालय हमारे छत्तीसगढ़ का मुकुटमणि और एशिया का गौरव है। उन्होंने पदक एवं उपाधि प्राप्त करने वालों को बधाई देते हुये कहा कि आप हर क्षण सीखने-सीखाने और राष्ट्र सेवा में लगे। ललित कलाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति के ध्वज वाहक बनें।
दीक्षांत समारोह केवल प्रमाण-पत्र बांटने की रस्म नहीं भविष्य के संकल्प का दिन है- कुलपति
कार्यक्रम को संबोधित करते हुये कुलपति प्रो.(डॉ.) लवली शर्मा ने कहा कि दीक्षांत समारोह केवल प्रमाण-पत्र बांटने की रस्म नहीं है, यह अपनी उपलब्धियों के सिंहावलोकन और भविष्य के संकल्प का दिन है। मुझे गर्व है कि हमारे विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिभा का परचम न केवल प्रदेश में बल्कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लहराया है। इस दौरान कुलपति ने विश्वविद्यालय में निरंतर हो रहे नवाचारों की जानकारी दी। साथ ही उन्होंने बताया कि किस तरह कुलपति के साथ ही यहां के शिक्षकों के द्वारा नवाचार के तहत शासन के विभिन्न विभागों से अनुदान लेकर विविध कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रीय सहित अंतर्राष्ट्रीय स्तर के महोत्सवों में विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की प्रतिभागिता की भी जानकारी प्रदान की। उन्होंने सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सोहन लाल द्विवेदी जैसे महाकवियों की कविताओं के माध्यम से विद्यार्थियों को निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। कार्यक्रम को कार्यकारिणी समिति के सदस्य एवं धरसींवा विधायक डॉ. अनुज शर्मा ने भी संबोधित किया और उपाधि एवं पदक प्राप्त करने वालों को बधाई एवं शुभकामनाएं दी।
राजकुमारी शारदा देवी सिंह बावली नामपट्टिका का हुआ अनावरण
कार्यक्रम के अंत में राज्यपाल एवं कुलाधिपति महोदय के कर कमलों से राजकुमारी शारदा देवी सिंह बावली नामपट्टिका का अनावरण किया गया। विश्वविद्यालय प्रांगण में स्थित यह बावली प्राचीन धरोहर है, जिसका संरक्षण किया जा रहा है। इंटेक संस्था के सहयोग से इस बावली का जीर्णोद्धार कर इसे संरक्षित करने का कार्य विश्वविद्यालय द्वारा किया गया है। कार्यक्रम के अंत में कुलपति ने उपस्थित अतिथियों को शॉल एवं श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. कौस्तुभ रंजन सहायक प्राध्यापक अंग्रेजी विभाग के द्वारा किया गया वहीं आभार प्रदर्शन कुलसचिव डॉ. सौमित्र तिवारी ने किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के अधिष्ठातागण, शिक्षकगण, अधिकारीगण, कर्मचारीगण एवं विद्यार्थीगण उपस्थित रहे।


