राम वनगमन से भरत मिलाप तक भावुक हुई रामलीला, दर्शकों की आंखें नम

केवट प्रसंग, दशरथ वियोग और चित्रकूट में भरत मिलाप का हुआ मार्मिक मंचन

अमिला (मऊ)। श्री ठाकुरद्वारा रामलीला समिति अमिला बाजार के तत्वावधान में आयोजित 208वीं ऐतिहासिक श्रीरामलीला महोत्सव में गुरुवार की रात राम वनगमन से चित्रकूट में भरत मिलाप तक की लीलाओं का भावपूर्ण मंचन किया गया। स्थानीय बाल कलाकारों ने अपने अभिनय से त्याग, भक्ति, भाईचारे और मर्यादा का संदेश दिया। दशरथ वियोग और भरत मिलाप के प्रसंगों ने दर्शकों को भावुक कर दिया।
पिता महाराज दशरथ के वचन का पालन करने के लिए प्रभु श्रीराम माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ वन के लिए प्रस्थान करते हैं। वनगमन के दौरान निषादराज गुह से भेंट और गंगा तट पर केवट प्रसंग का मंचन हुआ। प्रभु श्रीराम के प्रति केवट की अनन्य भक्ति और समर्पण ने दर्शकों का मन मोह लिया।
इसके बाद चित्रकूट में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के निवास का प्रसंग प्रस्तुत किया गया। इधर, पुत्र वियोग में महाराज दशरथ ने प्राण त्याग दिए। दशरथ वियोग के दृश्य ने रामलीला मैदान में मौजूद दर्शकों को भावुक कर दिया।
भरत मिलाप बना रामलीला का प्रमुख आकर्षण
महाराज दशरथ के निधन और श्रीराम के वनवास की जानकारी मिलने पर भरत शोकाकुल हो उठे। उन्होंने अयोध्या की राजगद्दी स्वीकार करने से इनकार कर दिया और गुरुजनों, माताओं तथा अयोध्यावासियों के साथ चित्रकूट पहुंचकर प्रभु श्रीराम से अयोध्या लौटने की विनती की।
हालांकि, पिता के वचन और अपनी मर्यादा को सर्वोपरि मानते हुए प्रभु श्रीराम ने वनवास की अवधि पूरी करने का संकल्प दोहराया। इसके बाद भरत ने श्रीराम की चरण पादुकाएं सिर पर धारण कीं और उन्हें अयोध्या ले जाकर उन्हीं के प्रतिनिधि के रूप में शासन करने का संकल्प लिया। श्रीराम और भरत के मिलन का दृश्य भाईचारे, त्याग और प्रेम की अनुपम मिसाल बनकर उभरा।
त्याग और मर्यादा का दिया संदेश
रामलीला के विभिन्न प्रसंगों ने दर्शकों को यह संदेश दिया कि सच्चा प्रेम त्याग, सच्ची भक्ति समर्पण और सच्चा धर्म कर्तव्य एवं मर्यादा के पालन में निहित है। स्थानीय बाल कलाकारों की भावपूर्ण प्रस्तुति ने ऐतिहासिक रामलीला महोत्सव की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को जीवंत कर दिया।


