मेरा मन कहता है कि मैं आसमान को छू लू…. श्रीमती संतोष ताम्रकार की कलम से

AP NEWS VISHWARAJ TAMRAKAR
मेरा मन कहता है कि मैं आसमान को छू लू उन उड़ते हुए परिंदों को अपना हमसफर बना लूं, परिंदों ने कहा उड़ते हैं हम आसमान में लेकिन बसेरा तो धरती में है आसमान में तो केवल ताजी हवाएं हैं दाना पानी , रेन बसेरा, पेड़ों की टहनियों में है अब परिंदे भी है मुश्किलों में पानी की कमी पेड़ पौधे काम होते जा रहे हरियाली की कमी महसूस होने लगी है सोचा आसमान में ताज़ी हवाओं से गुजरा कर ले अब तो वह भी मुश्किल हो रहा है, मोबाइल टॉवर, फैक्ट्री की काली विषैली धुएं से परेशान हमारी कई प्रजाति विलुप्त होती जा रही। इसका नहीं है किसी को खबर दूर से देखने से सब सुहाने लगते हैं पास जाओ तो जिंदगी का पता चलता है परिंदों की बातें सुनकर मेरा मन घबरा गया। मैं धरती पर रहूंगी अपने भाई बंधु परिवार के साथ पेड़ पौधे लगाऊंगी हरियाली वापस लाऊंगी जल संरक्षण करूंगी अपने घर के छत पर परिंदों के लिए दाना पानी रखूंगी हां सपना देखूंगी आसमान की पर सपनों को पूरा करने की कोशिश धरती पर करूंगी।



